Tuesday, 3 February 2026

कमरा नंबर 307: गेस्ट हाउस की एक अनसुलझी रहस्यमयी कहानी

 

कमरा नंबर 307 | 3:07 बजे की खौफनाक मिस्ट्री

शहर के पुराने हिस्से में बना “शांति गेस्ट हाउस” बाहर से बिल्कुल साधारण दिखता था।
तीन मंज़िलें।
पीली पड़ चुकी दीवारें।
और सीढ़ियों में अजीब सी खामोशी।

अरुण एक ट्रैवल ब्लॉगर था। उसे पुरानी, अनजानी जगहों पर रुकने का शौक था।
इसी शौक में वह उस गेस्ट हाउस में पहुँचा।

रजिस्टर पर नाम लिखते समय रिसेप्शन पर बैठे बूढ़े आदमी ने बिना सिर उठाए कहा-
“कमरा नंबर 307 मत लेना।”

अरुण मुस्कराया।
“सब लोग यही कहते हैं… तभी तो मज़ा आता है।”
वह माना नहीं, और उसने वही कमरा लिया।
कमरा नंबर 307

कमरा 307 साफ़ था, लेकिन
अजीब तरह से ठंडा।

रात के ठीक 3:07 बजे, अरुण की नींद खुल गई।
दरवाज़े के बाहर किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी।

टक… टक… टक…

फिर आवाज़ रुक गई।
दरवाज़ा नहीं खुला।
बस सन्नाटा।

सुबह उसने रिसेप्शन पर पूछा-
“कल रात कोई ऊपर आया था?”

बूढ़े आदमी ने सिर उठाकर पहली बार उसे देखा।
आँखें डर से भरी थीं।

“कमरा 307 में, कोई नहीं आता साहब।”

अरुण सारे दिन घूमता रहा।
रात को कमरे में गया।
तो उसने देखा कि 
दीवार पर कुछ लिखा है -

“मुझे यहाँ बंद किया गया है।”

अरुण ने सोचा, कोई मज़ाक कर रहा होगा।
उसने मोबाइल से फोटो खींची।

लेकिन फोटो में…
दीवार बिल्कुल खाली थी।

उसी रात फिर 3:07 बजे
आईने में एक परछाईं दिखी।

परछाईं ने धीरे से कहा-
“तुम भी मुझे भूल जाओगे…”

अब अरुण भी सोच में पड़ गया।
यहाँ जरूर कोई बात है।
सारी रात उसे नींद तो आई नहीं।
वो इसके बारे में ही सोचता रहा।

अगली सुबह 
अरुण ने इसके बारे में लोगों से पूछना चाहा।
लेकिन किसी से कुछ पता नहीं चला।
अरुण ने पुरानी फाइलें खंगालीं।
पता चला-

कमरा 307 में 15 साल पहले एक आदमी गायब हुआ था।
नाम था- अजय वर्मा
गेस्ट हाउस का पुराना मालिक।

केस कभी सुलझा नहीं।
कमरा बंद कर दिया गया।

आज अरुण की गेस्ट हाउस में आखिरी रात थी।
रात को आईने में फिर परछाई दिखाई दी।
अरुण ने आईने से कहा-
“तुम अजय हो, है ना?”

आईना टूट गया।

सुबह…
कमरा 307 खाली था।

अरुण का सामान पड़ा था।
मोबाइल, कैमरा, बैग-सब।

बस एक नई एंट्री रजिस्टर में थी-

नाम: अजय वर्मा
कमरा: 307
समय: 3:07

और अरुण…
कभी वापस नहीं मिला।

शांति गेस्ट हाउस आज भी है।
कमरा 307 आज भी बंद है।

और आज भी कोई कमरा नंबर 307 नहीं लेता।

Sunday, 1 February 2026

ऋषि उपमन्यु और भगवान शिव की सच्ची कथा

 भगवान शिव को भोलेनाथ यूँ ही नहीं कहा जाता। वे न पद देखते हैं, न उम्र, न धन—वे केवल सच्चे मन की भक्ति पहचानते हैं। आज हम आपको शिव जी के जीवन से जुड़ी एक ऐसी कथा बता रहे हैं, जो बहुत कम लोगों को पता है, लेकिन शिव भक्ति का सबसे गहरा रूप दिखाती है।


ऋषि उपमन्यु की शिव तपस्या का चित्र, भगवान भोलेनाथ का दिव्य दर्शन

प्राचीन काल में ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र थे उपमन्यु। बचपन से ही उनके हृदय में केवल एक ही नाम बसा था, महादेव।

एक दिन उपमन्यु ने अपने पिता से कहा

“पिताजी, मुझे संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए।
मुझे केवल भगवान शिव चाहिए।”

पुत्र की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए ऋषि व्याघ्रपाद ने उन्हें वन में भेज दिया और कहा
“वहाँ रहकर शिव की उपासना करना।
भोजन या सुख की कोई व्यवस्था नहीं होगी।”

उपमन्यु ने भी प्रण ले लिया कि वह महादेव जी को पाने के लिए कठोर तप करेंगे।

वन में उपमन्यु को न अन्न मिला, न फल।
पहले वे पत्तियाँ खाने लगे, फिर घास, फिर केवल जल।
अंत में जब जल भी नहीं मिला, तब उन्होंने भूखे-प्यासे केवल ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना शुरू कर दिया।

शरीर क्षीण होता गया, पर भक्ति और प्रबल हो गई।

यह देखकर शिवजी ने अपने भक्त की परीक्षा लेने की सोची।

भगवान शिव स्वयं ब्राह्मण का वेश धारण कर उपमन्यु के पास आए और बोले
“बालक, यह कठोर तप क्यों?
किसी अन्य देवता की पूजा कर लो, भोजन और सुख मिल जाएगा।”

उपमन्यु ने अत्यंत शांत स्वर में उत्तर दिया

“यदि शिव नहीं, तो जीवन भी नहीं।
मैं किसी और को नहीं जानता।”

उपमन्यु की यह बात सुनकर भोलेनाथ प्रसन्न हो गए।

महादेव जी का ब्राह्मण रूप लुप्त हो गया और भगवान शिव अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए।
उन्होंने उपमन्यु को उठाया, करुणा से देखा और कहा

“तूने भूख, कष्ट और मृत्यु से भी बड़ा मुझे माना है।
आज मैं तुझसे प्रसन्न हूँ।”

भगवान शिव ने उपमन्यु को दिव्य ज्ञान और पाशुपत अस्त्र प्रदान किया।
उपमन्यु आगे चलकर महान ऋषि बने और जीवन भर शिव भक्ति का प्रचार किया।

💛 गुरुकृपा 

Friday, 30 January 2026

आईना जो रात में ज़िंदा हो जाता है

 कुछ डर ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते…

बस महसूस होते हैं।


✨यह कहानी एक ऐसे आईने की है

जो रात होते ही सांस लेने लगता है।

और उसमें दिखने वाला अक्स…

आपका होकर भी आपका नहीं रहता।✨


डरावनी हिंदी हॉरर कहानी में रात के समय सांस लेता आईना

राजीव के बाथरूम में एक पुराना आईना है।
चौकोर।
किनारों पर जंग।

दिन में वो बिल्कुल सामान्य लगता है।
लेकिन रात को
राजीव उसे ढक कर सोता है।

क्योंकि एक रात
उसने उसे सांस लेते सुना था।

पहली बार
उसने ध्यान नहीं दिया।

नल बंद किया, लाइट बुझाई
और बाहर निकल आया।
लेकिन जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद हुआ

हाऽऽ… हाऽऽ…

धीमी, भारी साँसें।

राजीव जैसे जम गया।

उसने खुद से कहा
पाइप की आवाज़ होगी

अगली रात
उसने आईने पर तौलिया डाल दिया।

3:11 AM
उसकी नींद खुली।

बाथरूम से आवाज़ आ रही थी—
छप… छप…

जैसे कोई गीले हाथों से शीशा रगड़ रहा हो।

वह काँपते हुए उठा।
दरवाज़ा बंद था।

अंदर से उसे, उसी की आवाज़ आई

“तौलिया हटा दो
मुझे ठीक से देखना है।”

राजीव को ऐसा लगा कि 
उसके पैरों से जान निकल गई।

वह पीछे हटने लगा।

तभी
तौलिया अपने आप 
फर्श पर गिर गया।

आईना दिख रहा था।

और उसमें
राजीव खुद खड़ा था।

लेकिन
वह मुस्करा रहा था।

जबकि उसके चेहरे पर
डर ने अपना शिकंजा कसा हुआ था।

आईने वाला “राजीव”
धीरे-धीरे क़रीब आया।

उसने शीशे पर हाथ रखा।
और उसी पल
राजीव के गाल पर
उसे ठंडी उँगलियों का अहसास हुआ।

वह चिल्लाया

“तू कौन है?!”

आईने से जवाब आया

“जो तुम रात में बन जाते हो।”

आईने वाला “राजीव”
अब हँस रहा था।

उसकी आँखें
झपक नहीं रही थीं।
“दिन में तुम ज़िंदा रहते हो,”
“रात में…
मैं।”

अचानक
बाथरूम की लाइट बंद।

अंधेरे में
शीशा टूटने की आवाज़ आई।

सुबह

राजीव को फ़र्श पर होश आया।
आईना टूटा हुआ था।
लेकिन
उसमें खून से
एक लाइन लिखी थी

“अब मुझे शीशे की ज़रूरत नहीं।”

उसी रात
उसकी माँ ने कहा

“तू आजकल
आईने में आँखें झपकाता ही नहीं…”

और सच में…

उसने कोशिश की।
पर
राजीव की पलकें
हिल ही नहीं रहीं थीं।

और कहीं अंदर
कोई बहुत धीरे से
सांस ले रहा था।

💛 गुरुकृपा 

Tuesday, 27 January 2026

जब प्यार स्वार्थी नहीं होता | एक भावनात्मक प्रेम कहानी

 


यह कहानी है। कुणाल और ज्योति की। दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। दोनों का स्कूल भी एक ही था। कुणाल ज्योति से 2 साल बड़ा था। एक साथ 12 साल एक ही स्कूल में पढ़ना। बचपन से साथ स्कूल आना जाना हो। तो आपस मैं प्यार हो जाने के chances भी बहुत ज्यादा होते है।


     और हुआ भी ऐसा ही। पहली class की दोस्ती बारहवीं class तक आते आते प्यार में बदल गई थी। और यह कोई निब्बा नीबी वाला प्यार नहीं था। दोनों ने अपने भविष्य के लिए काफी कुछ सोच रखा था। दोनों स्कूल के अलावा कही इधर उधर नहीं मिला करते थे। 


     दोनों ने बारहवीं class पास की। और एक ही कॉलेज में admission लिया। अब दोनों काफी समय साथ बिताने लगे। और दोनों का प्यार और पक्का होने लगा।


     कॉलेज का आखिरी साल पूरा होने वाला था। और अब उनकी love story का turning point आने वाला था। दोनों ने कॉलेज पास किया। 


     अपनी अपनी योग्यता के अनुसार दोनों ने नौकरी भी ढूंढ ली। लेकिन ज्योति के घरवालों ने उसे नौकरी करने से मना कर दिया।

     उसके ताया जी बोले- हमारे घर में लड़कियां नौकरी नहीं करती। घर पर रहती हैं। घर संभालती है।


     उस समय दोनों को पहली बार लगा। कि वो अपनी बात कैसे करेंगे। ज्योति के घरवाले ज्यादा आधुनिक विचारधारा वाले लोग नहीं थे। वो जरा रूढ़िवादी थे। जबकि कुणाल के घरवाले फिर भी आधुनिक विचारों के थे।


     उस दिन ज्योति की जॉब का तो सपना टूटा ही, साथ ही शाम तक ऐसा कुछ हुआ। कि वो अंदर तक हिल गई। 

उस शाम उसकी बुआ घर आई। और ज्योति के लिए एक रिश्ता लेकर आई। आते ही बुआ बोली : भइया मैं अपनी ज्योति के लिए एक बहुत ही अच्छा रिश्ता लाई हूं। लड़का अपनी बिरादरी का है। और अच्छा कमाता भी है।


    बस क्या था। ये सुनकर ज्योति के घरवाले खुश हो गए। और लड़का देखने का time fix करने लगे। उस समय तो वह कुछ नहीं बोली, क्योंकि घर पर ताया, बुआ सब थे।

जब सब चले गए। तब उसने सोने से पहले सबके सामने बता दिया। कि वो कुणाल से प्यार करती है। और उस से ही शादी करेगी। 

  

    बस उसका इतना कहना था कि घर में गोला बारी चालू हो गई। उसके पिताजी बोले : ना तो वो हमारी बिरादरी का है, ना ही बराबरी का।


     इस पर ज्योति ने कहा: वाह। अब यह बात आपको याद आ रही है। जब बचपन से वो हमारे घर आता रहा हैं। आपके कितने मसले सुलझाए हैं उसने। जब भी मेरे लिए या किसी भी काम के लिए कुणाल की जरूरत होती थी। तब वो इस घर का बेटा होता था। लेकिन अब क्या हुआ है।


इतनी बात हुई थी कि ताया जी वापस आ गए। और उन्होंने सब सुन लिया।

     उन्हें देख साफ पता चल रहा था कि उन्हें कितना गुस्सा आ रहा था। लेकिन वो शांति से बोले : सुन बेटी चाहे तू कुछ भी बोल तेरी शादी वहां नहीं हो पाएगी। रही यह बात वो बचपन से यहां आता रहा है, आज तक मदद करता रहा है। तो इसका मतलब यह नहीं कि हम उस से तुम्हारी शादी करवा देंगे।

हां। अब आगे से उसका यहां आना, तेरा उस से मिलना सब बंद। समझ गई।


ज्योति के पापा से कहा कि कल के कल लड़का देखो और रिश्ता पक्का करो। अगर लड़का सही है तो।


    ज्योति गिड़गिड़ाने लगी। पर उसकी बात किसी ने नहीं सुनी।

रात को उसने फोन करके सब कुछ कुणाल को बता दिया। कुणाल भी हक्का बक्का रह गया। अब उन्होंने तय किया। कि कुणाल कल आ कर बात करेगा। 


अगली सुबह वह job पर जाने से पहले अपनी मां के साथ ज्योति के घर पहुंच गया।

     जैसे ही वो उनके घर में दाखिल हुए। अभी बैठे भी नहीं थे। कि उसके ताया जी, और उसके पापा हाथ जोड़कर खड़े हो गए। और कुणाल की मां से बोले: बहन जी। बिनती है आप से इनकी शादी की बात मत कीजिएगा। क्योंकि जो हो नहीं सकता। उसके बारे में बात करने का कोई फायदा नहीं। और कोई सेवा हो तो बताए।


कुणाल बोला: अंकल यह सब पुरानी बातें है। आज कोई भी इन बातों को नहीं मानता।

ताया जी बोले: बेटा हम भी 70 साल पुराने हैं। और हम मानते हैं।

कुणाल को गुस्सा आ गया। वो कुछ कहता ज्योति की मम्मी बोली: ऐसा है अब आप जा सकते हो।

कुणाल की मम्मी यह सुनकर खड़ी हुई और वापस आ गई।

घर आ कर कुणाल कुछ नहीं बोला और गुस्से में ऑफिस चला गया।

    उस रात कुणाल घर वापस नहीं आया। उसकी मां ने भी कई बार फोन try किया। पर उसने नहीं उठाया। रात के 2 बज गए। कुणाल की मां ने उसके सब दोस्तों के घर फोन घूमा डाला। पर कहीं से कुछ भी नहीं पता चला।


     तभी ढाई बजे के करीब दरवाजे पर बहुत जोर जोर से दस्तक होने लगी। जैसे ही उसने दरवाजा खोला।


   ज्योति के ताया जी, पिताजी, भाई एकदम गुस्से में भरे घर में घुस गए। और कुणाल को आवाज़ देने लगे। जब कुणाल नहीं मिला। तो उसकी मां से बोले: दोनों कहां है। कहां छुपाया है उन्हें। यह सुनकर उसको सारी बात का अंदाजा हो गया कि कुणाल और ज्योति भाग गए थे।

    कुणाल की मां बोली : मुझे नहीं पता। मुझे कुछ नहीं पता।

तब ज्योति के पिताजी बोले: देखो ऐसा है हमने पहले ही मना कर दिया था।


   अब दोनों ने मिलकर ये कदम उठाया हैं तो ठीक हैं। एक बात याद रखना। अगर हमारे हाथ यह दोनों लगे। तो हम ज्योति को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि हम सिर्फ अपनी बेटी को जानते है। और वो बचपन से हमारे घर के नियम जानती है। तब भी उसने ऐसा किया। तो गलती उसकी है। सजा भी उसी को मिलेगी।

इतने में कुणाल और ज्योति भी वहां आ पहुंचे। उन्होंने सारी बात सुन ली।

ज्योति के ताया बोले—

“अब फैसला तुम्हें ही करना है।

हम तो खुशी-खुशी इसे खत्म करके जेल चले जाएंगे।

सारी ज़िंदगी वहीं काट लेंगे।


तुम बताओ कुणाल,

क्या तुम्हें सही लगता है

तुम्हारे प्यार का जिंदा रहना

और कई ज़िंदगियों का बर्बाद हो जाना?


या फिर तुम्हारे प्यार का मर जाना,

ताकि किसी और की ज़िंदगी उजड़ने से बच जाए?”


कुणाल ज्योति से बहुत प्यार करता था।

वो पूरी ज़िंदगी उसके साथ रहना चाहता था।

लेकिन इतना खुदगर्ज नहीं था

कि अपने प्यार के लिए सबको जला दे।


उसने एक कदम पीछे हटकर

ज्योति को आगे कर दिया।

और कहा—

“मैं ज्योति से बेइंतहा प्यार करता हूँ।

उसे खोकर शायद मैं भी जिंदा न रह पाऊँ।


लेकिन मेरी माँ है… मेरी बहन है…

उनका इसमें कोई कसूर नहीं।

तो सज़ा वो क्यों भुगतें?”


फिर उसने ताया जी की तरफ देखा—


“कल को अगर मेरी बेटी होगी,

तो मैं उसे पूरी आज़ादी दूँगा

अपने लिए प्यार चुनने की।

बस वो इंसान ईमानदार हो,

और सच्चा प्यार करने वाला हो।


चाहे मैं तब 70 का होऊँ या 80 का।”


उसने ज्योति की तरफ देखा,

आँखें नम थीं—


“गलती हुई है…

पाप नहीं,

कि उसकी जान ले ली जाए।”


उसने ज्योति से माफ़ी माँगी

और सबको जाने को कहा।


इतने में ज्योति के ताया जी की आवाज़ आई—


“बेटा, हमें माफ़ कर दो।

तुम दोनों का प्यार स्वार्थी नहीं है।


जब तुम अपने प्यार,

अपनी माँ और बहन के लिए

इतनी बड़ी कुर्बानी दे सकते हो,

तो हमारी बिटिया को

कितना खुश रखोगे —

इसकी हमें चिंता नहीं।”


उन्होंने गहरी साँस ली—


“आज हम किसी को मारने आए थे…

इसलिए मारेंगे

 तो सही लेकिन 

अपने पुराने विचारों को।”

घर में पहली बार

हँसी गूँजी।


दो हफ्ते बाद

कुणाल और ज्योति की शादी हो गई।

💛 गुरुकृपा


Saturday, 24 January 2026

“जब लाशें बोलने लगीं”

 

एक इंस्पेक्टर अपराध स्थल पर जांच करता हुआ, रहस्यमयी क्राइम सीन”

इंस्पेक्टर राजदीप एक बहादुर, नेक और बेहद ईमानदार अफ़सर थे।

ड्यूटी उनके लिए सिर्फ़ नौकरी नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी थी।
शायद यही वजह थी कि बड़े से बड़ा केस भी उनके सामने ज़्यादा देर टिक नहीं पाता था।

एक दिन शहर में एक दिल दहला देने वाला मर्डर हुआ।
केस सीधे इंस्पेक्टर राजदीप को सौंप दिया गया।

मौके पर पहुँचते ही उन्होंने देखा
एक युवती की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

जब राजदीप ने चश्मदीदों से पूछताछ की,
तो सबका बयान एक जैसा था
कत्ल से ठीक पहले, उन्होंने एक आदमी को उस लड़की के फ्लैट में जाते हुए देखा था।

लेकिन सवाल ये था
वो आदमी कौन था? और क्या सच वाकई उतना आसान था जितना दिख रहा था?

मगर इंस्पेक्टर राजदीप ऐसा इंसान नहीं था जो सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा कर ले।
उसने अपनी तरफ़ से जांच शुरू की।
धीरे-धीरे सच की परतें खुलने लगीं।

जांच में सामने आया कि जिस आदमी को आख़िरी बार देखा गया था, वह शहर का एक बड़ा बिज़नेस मैन था।
और जिसकी हत्या हुई थी। वह एक निडर, बेखौफ़ रिपोर्टर थी।

इतना जान लेना ही राजदीप के लिए काफ़ी था।
उसे पूरा मामला समझ में आने लगा।

जांच तेज़ हुई।
सीसीटीवी फुटेज, दस्तावेज़, गवाह, हर सबूत इकट्ठा किया गया।

सच साफ़ था।
वह बिज़नेस मैन नकली दवाइयों का बड़ा धंधा चलाता था।
उसकी अवैध गतिविधियों से जुड़े अहम दस्तावेज़ और तस्वीरें उस रिपोर्टर के पास थीं।
वह आदमी उसे रोकना चाहता था, किसी भी क़ीमत पर।

लेकिन सारे सबूत होने के बावजूद, वह आदमी बच निकला।
पैसे और ताक़त के दम पर उसने सब कुछ पलट दिया।
मासूम लड़की को ही दोषी ठहरा दिया गया।
और वह ख़ुद, बाइज्ज़त बरी हो गया।

उस दिन इंस्पेक्टर राजदीप टूट गया।
उसे पहली बार लगा कि इंसाफ़ हार गया है।

वह बहुत रोया।
रोते-रोते कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला।

सुबह जब उसकी नींद खुली, तो उसे अपना शरीर अजीब तरह से हल्का महसूस हुआ।
सब कुछ कुछ अलग-सा लग रहा था।
लेकिन उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और काम के लिए तैयार हो गया।

थाने पहुँचते ही ख़बर मिली
शहर में एक और मर्डर हुआ है।

राजदीप अपनी टीम के साथ मौके पर पहुँचा।
जैसे ही उसने लाश को छुआ
उसे एक ज़ोरदार झटका लगा।

उसके सामने जैसे कोई टीवी चल पड़ा हो।
उसे साफ़-साफ़ दिखने लगा
कत्ल कैसे हुआ, क्यों हुआ, किसने किया।
यहाँ तक कि सबूत कहाँ मिलेंगे, यह भी।

राजदीप वैसा ही करता गया जैसा उसने देखा था।
नतीजा
कातिल पकड़ा गया।
उसने अपना जुर्म कबूल किया।
और इस बार, इंसाफ़ हुआ।

इसके बाद राजदीप ऐसे ही एक-एक कर कई केस सुलझाता गया।
वह खुश था।
क्योंकि अब सच जीत रहा था।

लेकिन फिर एक दिन
एक ऐसा केस आया, जिसने उसकी आत्मा तक को हिला दिया।

एक पुराने, बंद पड़े गोदाम में एक लाश मिली थी।
राजदीप जैसे ही पास गया और लाश को छुआ
वही झटका लगा।

मगर इस बार जो दृश्य सामने आया, उसने उसके कदम रोक दिए।

उसने देखा
वह ख़ुद वहाँ खड़ा है।
उसके हाथ खून से सने हैं।
और सामने पड़ा है वही बिज़नेस मैन
जिसे कभी कानून ने छोड़ दिया था।

राजदीप घबरा गया।

उसे समझ आ गया कि यह शक्ति सिर्फ़ सच दिखाने के लिए नहीं है
बल्कि उसके बोझ को महसूस कराने के लिए भी है।

उसे उस रिपोर्टर की आँखें याद आ गईं
डर, हिम्मत और अधूरी लड़ाई।

राजदीप ने आँखें बंद कीं और मन ही मन कहा
“मैं जज नहीं बन सकता
लेकिन इंसाफ़ का रास्ता ज़रूर बना सकता हूँ।”

उसने अपनी टीम को बुलाया।
पुराने केस को दोबारा खुलवाया।
नए और पुख्ता सबूत पेश किए गए।

इस बार पैसे और ताक़त दोनों हार गए।

बिज़नेस मैन को सज़ा मिली।
देर से ही सही, लेकिन सच जीत गया।

उस दिन के बाद राजदीप ने एक फ़ैसला किया।
वह इस शक्ति का इस्तेमाल तभी करेगा
जब कानून के सारे रास्ते बंद हो जाएँ।

क्योंकि उसने समझ लिया था

इंसाफ़ चमत्कार से नहीं,
ज़िम्मेदारी से पूरा होता है।

और उसी दिन,
पहली बार

राजदीप को अपना शरीर हल्का नहीं
बल्कि शांत महसूस हुआ।

Friday, 23 January 2026

महंगी सीट नहीं, जवान की जान की कीमत है — एक अंतरात्मा को झकझोरने वाली कहानी

       


      गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो गई थी। गीत के मामा मामी, मासी और उसकी फैमिली ने मिलकर घूमने का प्रोग्राम बनाया। जगह फाइनल हो गई। जहां जाना था। ट्रेन की tickets भी बुक हो गई। उनकी Rajdhani की फर्स्ट क्लास sleeper ki tickets थी। उन सबकी सीट्स एक साथ थी। जिस कारण एक पूरा chamber 8 seats का उनका ही था। और यह बड़े मजे की बात थी।

      वो दिन भी आ गया। जब सबको निकलना था। सब अपने - अपने घरों से रेलवे स्टेशन पर मिले। कुछ देर बाद ट्रेन भी आ गई। और सब उस पर चढ़ गए। सब अपनी - अपनी seats पर बैठ गए। सब नाचते गाते, मजे करते हुए जा रहे थे। सबको बहुत मज़ा आ रहा था। जहां वो जा रहे थे। वहां के सफर में एक रात ट्रेन में ही गुजारनी थी। अब रात भी हो गई थी। सब सोने की तैयारी कर रहे थे। गीत और उसके भाई - बहनों को आखरी warning मिल गई थी। कि जल्दी सो जाओ। क्योंकि आस - पास के लोग भी सोने वाले थे। इसीलिए सबको सोना पड़ा।

     अभी एक घंटा ही हुआ था। गाड़ी झटके से उस स्टेशन पर रुकी। जहां उसे नहीं रुकना था। और बहुत सारे army के जवान हमारी ट्रेन पर चढ़ गए। वो इतने सारे थे। कि ट्रेन खचाखच भर चुकी थी। सभी यात्री जाग गए थे। गीत के मामा ने एक जवान से पूछा - क्या हुआ है? भाई

     वह बोला - कि अचानक ही देश के बॉर्डर पर बहुत हलचल हो रही हैं। इसलिए हम सब की छुट्टियां कैंसिल कर दी गई है। और तुरन्त बुलाया गया है।

तभी ट्रेन में भी यह अनाउसमेंट हो गई। और सभी यात्रियों से अनुरोध किया गया कि वो कार्पोरेट करें।

      तभी गीत के कोच के साथ में बैठे एक सज्जन जोर से चिल्लाने लग गए। कि यह क्या तरीका है। हम इतनी महंगी टिकट खरीद कर आए। उसके बाद इतनी मुसीबत भी झेले। और साथ ही अपनी सीट भी share करें। उनके साथ कई और लोग भी हां में हां मिलाने लगे। हम सो रहे थे। डिस्टर्ब कर दिया। 

     गीत यह सब चुपचाप सुन रहा था। और देख रहा था। कि किसी भी जवान ने पलट के जवाब नहीं दिया। जिसको जहां जगह मिली। वो वहां खड़े हो गए। ना ही किसी से उन्होंने सीट मांगी। पर अभी पूरी रात पड़ी थी।

    यह देखकर गीत को बड़ा गुस्सा आया। वो बहुत तेज चिल्लाया और सबको चुप रहने को कहा और जवानों से बोला - आप लोग इस कोच में आ जाओ। यह सब हमारे परिवार की सीटें है। आप सब यहां आराम से बैठो या लेट कर आराम कर लो। क्योंकि उसने जवानों को यह कहते हुए सुन लिया था। कि उन्हें खाना छोड़ कर आना पड़ा है।

   फिर वो उन अंकल के पास गया और कहा - एक बात बताएं आप इनके आने से disturb हो गए। और आप अपनी सीट भी शेयर नहीं करना चाहते। क्योंकि इसकी टिकट बहुत महंगी है। यह जवान भी तो आराम से अपने घरों में अपनी family के साथ खाना खा रहे थे। पर जैसे ही इन्हें पता चला कि border पर हलचल हो रही है। तो यह अपना आराम, खाना और परिवार छोड़ कर, आप और आपके जैसे इन एहसान फरामोश देश वासियों को बचाने आ गए। 

    जब बॉर्डर पर दुश्मन की गोली चलेगी और किसी जवान को लगेगी। तो क्या वो आपकी सीट से ज्यादा महंगी होगी। आप अपने आप को देखो जो अपनी सीट share नहीं कर पा रहे। उनके लिए, जो मौका आने पर आपके लिए अपनी जान sacrifice करेंगे। इतने में एक जवान बोला - कोई बात नहीं। गीत ने कहा - कुछ नहीं होता। हम सब को तो घर जाकर टांगे फैलाकर सो जाना है। लेकिन आप लोग को जाते ही बॉर्डर पर तैनात हो जान है। और उन अंकल को देखकर गीत ने कहा - शर्मा कीजिए। इनकी मदद करने की बजाय आप अपना ही रोना रो रहे हो।

इतने में गीत की मां ने उसे बुलाया और कहा - बेटा देखी यह थोड़ा सा नाश्ता है। यह तो उन्हें दो ताकि वो खा सके।

     हमारी यह बातें सुनकर और लोगों को भी शर्म आई। उन सब लोगों ने भी अपनी सीट share करनी शुरू कर दी। ओर उन्हें जो कुछ भी था खाने को देना शुरू किया। 

    अब तो उन सज्जन को भी शर्म आई। और आकर उन्होंने माफी मांगी। अब क्या था। सब आराम से set हो गया। अब सब जवानों को जगह मिल गई थी। रात निकल गई। सुबह होते ही सब जवान उतर गए। और जाते वक़्त उन जवानों ने गीत को धन्यवाद किया।

💛 आशीर्वादसहित

Wednesday, 21 January 2026

पहली कमाई, सबसे बड़ा सबक: एक बेटे के अल्हड़ से समझदार बनने का सफ़र

 

“बेटे की समझदारी और पिता की खामोश कुर्बानी दर्शाता दृश्य”


    मैं आज बहुत खुश था। क्योंकि आज मेरी पहली जॉब लग गयी थी। इतनी मेहनत करने के बाद मुझे मेरी dream job मिल गयी थी। Salary भी अच्छी थी। बस क्या था। मै बहुत खुश था। मैने सोचा कि अब मैं वो सब सपने पूरे करूँगा। जो अब तक पूरे नहीं हो पाए थे।
     घर पर भी सब बहुत खुश थे। मैंने जॉब् पर जाना शुरु कर दिया था। आने-जाने के पैसे, अपने खर्च के लिए जो भी पैसे थे। वो इस बार तो पापा ने दिये। मगर मन में कहीं न कहीं यह संतुष्टि थी। कि अगली बार से यह पैसे पापा को नहीं देने पड़ेंगे। बल्कि मैं पापा का घर खर्च में हाथ बटाऊंगा।
      दो - तीन दिन बीत गये। एक दिन सभी दोस्तोँ ने कहीं घूमने का program बनाया। मैने भी हामी भर दी। और सब घूमने के लिए निकल पड़े। घुमते - घूमते रात हो गयी थी। सब आपस में बैठकर बाते कर रहे थे। बात करते हुए सब अपने बचपन की बाते कर रहे थे। मैं भी अपने बचपन की बातें करने लगा। बातों - बातों में, मैंने कहा कि बचपन में ऐसा नहीं था। कि मेरी जरूरतें पूरी नहीं होती थी। लेकिन मनचाही चीजें बहुत ही कम मिल पाती थी. मैं कब से अपने पापा से मेरा dream phone दिलाने के लिए कह रहा था। लेकिन देखो अभी तक मेरे पास नहीं है।ऐसे ही जब सबके पास कार थी। तब भी और अब भी हमारे पास कार नहीं है। मेरी यह बातें सुनकर मेरे दोस्तों ने कहा - कि अब खुद कमा रहे हो, सब शौक पूरे कर लेना. बस यही बातें करते हुए कब हम घर पहुंच गये। पता ही नहीं चला. और सच कहूं उस दिन बहुत मज़ा आया। दिल का गुबार निकाल कर।

      पहला महीना बीता। और अगले महीने की पहली तारीख को मेरी पहली salary आई । मैं बहुत खुश कि आज मेरे पास मेरी कमाई थी। जैसे मर्जी वैसे खर्च करूंगा। यह सोचकर मैं बहुत खुश था। मैंने घर आते हुए। अपने पहले सपने को पूरा करने का सोचा। और market में रुक कर उस फोन की कीमत पूछी। तो मेरे तोते ही उड़ गए। उसकी कीमत मेरी salary से दुगुनी थी। मैं चुपचाप दुकान से बाहर निकल आया। और फिर सोचने लगा कि काश पापा उस समय ले लेते तो इतना महंगा नहीं होता। खैर कोई नहीं 2 salary मिला कर ले लूंगा। यह सोचकर मैं घर आ गया।
घर आकर देखा तो दीदी जीजाजी घर आए हुए थे। उन सब से मिलकर बहुत अच्छा लगा। मैंने सबको अपनी पहली salary बताई। मां ने सबसे पहले भगवान जी के चरणों में उसे रखा। यह हमारे घर में शुरू से था। जब पापा या दीदी की भी salary आती थी। मां सबसे पहले भगवान जी के चरणों में रखती थी।
       मेरे आते ही दीदी जीजाजी घर जाने की जल्दी करने लगे। मुझे बहुत अजीब लगा। क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। जब बहुत ज़ोर दिया। तो पापा ने बताया- कि दीदी को एक साथ बहुत पैसे की जरूरत आ पड़ी थी। पापा ने तो अपनी आधे से ज्यादा पेंशन दीदी को दे दी थी। पर अभी भी पैसे पूरे नहीं पड़ रहे थे।
मेरी पहली salary थी। इसलिए कोई मुझे कह नहीं रहा था। मैंने दीदी से कहा - यह क्या बात हुई दीदी मैं आपका बड़ा न सही छोटा सही पर भाई हूं। और भगवान की दया से अच्छा कमा भी रहा हूं। इसलिए चिन्ता की जरूरत नहीं। फिर मैने भी अपनी सैलरी से अपने daily expenses निकाल कर सारे पैसे दीदी को दे दिए। और जब मैं यह कर रहा था। तो मुझे proud भी feel हुआ। और अपनी सोच पर शर्मिंदगी भी।

     क्योंकि मेरे मन में यह बात चल रही थी। कि मैंने दीदी की समय रहते मदद की। साथ यह भी एहसास हुआ कि अभी मैं अपने dream phone की कीमत पूछ कर आया था। ओर अगले महीने लेने वाला था। लेकिन अचानक आए इस खर्चे के कारण नहीं ले पाऊंगा। और यही शायद पापा के साथ होता होगा। क्योंकि वो उस वक्त अकेले कमाने वाले थे। उन पर हम दोनों भाई-बहन, हमारे दादा - दादी सबका खर्चा था। और यही वो स्थिति होती है। जहां जरूरतों की priority को देखकर जरूरत पूरी की जाती है। जो अधिक जरूरी है वो पहले। बाकी सब बाद में या जब समय आएगा तब। मुझे यह भी ध्यान है। कि पापा ने खुद काफी समय तक keypad mobile use किया था। मुझे और दीदी को smartphone लेकर दिए थे। और रही कार तो हमारे middle class families में कहा जाता है कि "हाथी बांधना, और पालने" में बहुत फर्क होता है। 
कोई नहीं अब मैं भी कमा रहा था और अब यह हाथी हमारे लिए affordable हो गया था। पापा जैसे ही दीदी को बाहर तक छोड़ कर वापस आए। मैंने उन्हें जोर से गले लगा लिया। और धीरे से लेकिन दिल की गहराइयों से उन्हें sorry कहा। पापा ने कहा - क्या हुआ।
मै बोला - आज जिंदगी का बहुत बड़ा सबक सीख लिया। पापा ने सुना और मुस्कराने लगे। और मां से कहा हमारा बेटा समझदार हो गया है।
      ऐसे ही 4 - 5 महीने बीत गए। दीदी ने 2 महीने बाद ही सारे पैसे लौटा दिए। बहुत मन किया। पर जीजाजी नहीं माने।
एक साल बीत गया। मां - पापा की शादी की सालगिराह थी। पापा ने दीदी जीजाजी को भी घर बुलाया था। मुझे नहीं पता था। मैं शाम को घर पहुंचा। मैने मां - पापा को एक लिफाफा दिया। और कहा कि letter box में यह आपके नाम का लेटर आया हुआ है। आपने देखा नहीं। पापा ने जैसे ही लिफाफा खोला। उसमें से गाड़ी की चाबी निकली। मैंने कहा - यह आपकी सालगिरह का तोहफ़ा है। मां हंसी और कहा - हमारे पास भी तुम्हारा return gift hai आंख बंद करो। और मेरे हाथ में मेरा dream phone with latest version था। पापा ने कहा - तुम्हारी दीदी जीजाजी को भी उनका गिफ्ट मिल गया है।
आज मैं बहुत खुश था। क्योंकि मेरा सबसे बड़ा सपना मेरे मां - पापा ने ही पूरा किया।

     आखिर में एक बात अपने सभी पाठकों से कहूंगी कि चाहे कोई सी भी genration हो। कुछ चीजें हमारी कमाई से हमेशा दोगुनी कीमत की होती हैं। उनके लिए सही समय का इंतजार और सब्र करना हमेशा अच्छा होता है। 

💛 गुरुकृपा 

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