Saturday, 14 February 2026

महाशिवरात्रि पूजा विधि और आध्यात्मिक महत्व

 

महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का जल और दूध से अभिषेक करते हुए श्रद्धालु

     महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत पवित्र पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। यह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करते हैं।

🌸 महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

शिव पार्वती विवाह

     मान्यता है कि इस पावन रात्रि में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यह दिन शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक है। शिवरात्रि की रात को अत्यंत शुभ और ऊर्जावान माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन के कष्ट दूर होते है।



📖 पौराणिक कथा

समुद्र मंथन

      समुद्र मंथन के समय जब विष (हलाहल) निकला तो पूरी सृष्टि संकट में आ गई। तब भगवान शिव ने वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। शिवरात्रि का पर्व उनकी इसी त्याग और करुणा की भावना को दर्शाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक शिकारी ने अनजाने में पूरी रात बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाए, जिससे उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। इससे यह संदेश मिलता है कि सच्ची श्रद्धा ही सबसे बड़ा पूजन है।



🛕 पूजा विधि (विस्तार से)

1. प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. व्रत का संकल्प लें और दिनभर फलाहार करें।

3. शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से अभिषेक करें।

4. बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और फल अर्पित करें।

5. “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें।

6. रात्रि में चार प्रहर की पूजा करें और जागरण करें।

मेरा मानना है कि भोलेनाथ महादेव, शुद्ध और सच्चे मन से की हुई हर पूजा को स्वीकार करते हैं।

🌙 व्रत का महत्व

महाशिवरात्रि का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति मिलती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। अविवाहित कन्याएँ उत्तम वर की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि विवाहित महिलाएँ परिवार की सुख-शांति के लिए पूजा करती हैं।

🌺 निष्कर्ष

महाशिवरात्रि केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और भक्ति का पर्व है। यह हमें संयम, त्याग और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।

हर हर महादेव! 🕉️
भगवान शिव की कृपा आप और आपके परिवार पर सदा बनी रहे।

💛 गुरुकृपा 


Wednesday, 11 February 2026

चलती रिक्शा से कूद गई बच्ची | सच्ची घटना और हिम्मत की कहानी

छोटी बच्ची की हिम्मत से टली बड़ी अनहोनी

 

एक खुशहाल दिन जो डर में बदल गया

यह बहुत पुरानी बात है, जब शहर में सिर्फ साइकिल रिक्शा चला करते थे। हम पाँच लोगों का छोटा सा परिवार था — मम्मी, पापा, मैं गीतू, मेरी बड़ी बहन रीतू और छोटा भाई गोलू।

उस दिन हम सब बहुत खुश थे क्योंकि हम घूमने जाने वाले थे। पापा रिक्शा लेकर बाहर खड़े थे। मम्मी तैयार हो रही थीं। रीतू अपनी सहेली निधि के साथ बाहर खेल रही थी।

खेलते-खेलते दोनों मज़ाक में रिक्शा पर बैठ गईं। तभी रिक्शावाले ने कहा, “चलो बेटा, गली का एक चक्कर लगवा देता हूँ।”
दोनों छोटी थीं… और मान गईं।


जब रिक्शा गली से बाहर निकल गई

शुरुआत में सब सामान्य लगा। रिक्शा धीरे-धीरे गली में घूम रही थी।

लेकिन अचानक… वह गली से बाहर निकल गई।

मंदिर पीछे छूट गया। अब रिक्शा छोटे बाज़ार की ओर बढ़ रही थी।

उसकी रफ्तार तेज होती जा रही थी।

रीतू को कुछ गड़बड़ महसूस हुआ। उसने धीरे से निधि से कहा,

“कुछ ठीक नहीं है… ये हमें दूर ले जा रहा है…”

अब दोनों के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

छोटी सी बच्ची का बड़ा फैसला


छोटी सी बच्ची का बड़ा फैसला

निधि घबरा गई थी। लेकिन रीतू ने हिम्मत दिखाई।

“अगर अभी नहीं कूदे… तो पता नहीं कहाँ ले जाएगा…”

चलती रिक्शा… तेज रफ्तार… और एक पल का फैसला।

रीतू ने पहले निधि को खड़ा किया और उसे धक्का देकर नीचे गिरा दिया। फिर खुद भी कूद गई।

दोनों सड़क पर गिर गईं। चोट लगी। लोग चिल्लाए। कुछ लोग रिक्शावाले के पीछे भागे, लेकिन वह भाग निकला।

उसी समय पापा भी उन्हें ढूंढते हुए वहाँ पहुँच गए।

हिम्मत ने बदल दी पूरी कहानी

पहले डांट पड़ी…

फिर जब चोटें देखीं तो डांट चिंता में बदल गई।

डॉक्टर के पास ले जाया गया। पट्टी हुई। इंजेक्शन लगे।

उस दिन घूमने का प्रोग्राम रद्द हो गया।


लेकिन एक बात तय हो गई —

उस छोटी सी हिम्मत ने दो जिंदगियाँ बचा लीं।

आज भी जब हम उस घटना को याद करते हैं, तो भगवान का शुक्रिया करते हैं कि सही समय पर सही फैसला लिया गया। इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि...

* बच्चों की सुरक्षा क्यों है ज़रूरी?

* यह सच्ची घटना हमें कुछ जरूरी सीख देती है:

* बिना बड़े के साथ किसी भी वाहन में न बैठें।

* अनजान व्यक्ति की बातों में न आएँ।

* खतरा महसूस हो तो तुरंत शोर मचाएँ।

* माता-पिता बच्चों को सुरक्षा के बारे में जरूर सिखाएँ।


निष्कर्ष

यह सिर्फ एक हिम्मत की कहानी नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा का संदेश है।

कभी-कभी एक छोटा सा साहसिक कदम पूरी जिंदगी बदल देता है।

Monday, 9 February 2026

मैं ऐसा क्यों हूँ?

 

एक युवक अपनी ज़िंदगी की घटनाओं को याद करते हुए गहरी सोच में बैठा हुआ

मेरा नाम कन्हैया है। आज में आपके साथ अपनी कहानी साझा करना चाहता हूँ। आप भी कहेंगे कि मेरी कहानी में ऐसा क्या है जो पढ़ा जाये। तो मेरा कहना है कि जनाब एक बार पढ़िए तो सही बार बार पढ़ने का मन करेगा।

तो फिर ऐसा है कि शुरू करते हैं।
नाम जैसे ही पहले बताया है आपको 
हमारा कन्हैया है।
हम एक middle class family में पैदा हुए।
हमारा जनम हमारी 2 बहनों के बाद हुआ।
यही कारण था कि हम जरा ज्यादा ही लाडले थे।

कहानी शुरू से शुरू करते है।
बात है। हमारे जन्म की। हमारी माँ हॉस्पिटल के operation theatre में थी। हमारे आने की तैयारी हो रही थी। सब बढ़िया से हो रहा था। जैसे ही हम इस दुनिया में आए। और जैसे ही पहली बार रोये। 

वहां खड़ी एक sister जल्दी मे डॉक्टर के पास आने के लिए जैसे ही बढ़ी। उसका पैर फिसला और वो गिर गई। उनके हाथ में facture हो गया। और वो 3 महीने की छुट्टी पर चली गई।

इस घटना को सबने उनकी लापरवाही या किस्मत समझा।

मेरे घर में तो खुशियों का माहौल था। धीरे धीरे समय बीतता गया। 
अब मैं 1 साल का हो गया था। लड़खड़ा कर चलना शुरू कर दिया था मैंने। एक फोन मै ऐसे ही चल रहा था। मेरे दादा जी जमीन पर लेटे हुए थे। और उनके सर के पास पर गर्म चाय टेबल पर पड़ी थी।
जैसे ही मैं उनके पास पहुंचा। मैं लड़खड़ाया मेरा हाथ टेबल पर लगा और चाय दादाजी के सर पर गिर गई। वो दर्द से चिल्लाते हुए उठ गए। सभी घर के लोग एकत्रित हो गए। और इस घटना को भी अचानक हुई घटना का नाम दिया गया। और मुझे बहुत प्यार किया गया।

फिर जब मैं school कि 5वी class में पहुंचा। तो मेरी class में फंक्शन की तैयारी हो रही थी। नाटक की रिहर्सल चल रही थी। 
नाटक की तैयारी क्लॉस में चल रही थी।

सीन यह था कि एक लड़के को झण्डे को ऊपर उठा कर हिलाना था। जो लड़का झण्डे देने के लिए खड़ा था। वो अचानक झंडा वही छोड़ कर चला गया था। और मैं वही खड़ा था। पहले नाटक नीचे खड़े होकर हो रहा था। और इशारा मिलते ही वो झंडा उसे देना था। और उसे वो लहराना था।

रिहर्सल जोर शोर से हो रही थी। उस लड़के की height छोटी थी। तो टीचर ने उसे बेंच के ऊपर खड़े हो कर एक्टिंग करने को कहा। और पंखा भी बिल्कुल उसके ऊपर था। इस बार उसे झंडे के बिना एक्टिंग करनी थी। क्योंकि ऊपर पंखा था।
लेकिन हुआ यह सब उत्साह में एक्टिंग कर रहे थे। मैं भी उसके पास खड़ा हो गया। और जोश जोश में मैने उसे वो झंडा पकड़ा दिया। और उसने भी लहरा दिया। 

फिर क्या हुआ। झंडा टकराया पंखे से, लड़का बहुत पतला था। पंखा high speed में चल रहा था। झटके से वो लड़का दूर जाकर गिरा। और उसे बहुत सी चोटे आई। और उस दिन मुझे बहुत डांट पड़ी। स्कूल से भी, और घर में भी। वो पहली बार घर में सबने notice किया। कि जब हम जोश में होते है। तो दूसरे के साथ बुरा होता है। हमें संभल कर रहने की हिदायत दी गई।

हम भी संभल कर चले। समय बीतता गया। अब हम college में आ गए। हमने जोश से नहीं होश से काम लेना शुरू कर दिया था।
College की तरफ से हमें trip में ले जाया जा रहा था। हम सब hill station जा रहे थे। 3 , 4 दिन का ट्रीप था। एक दिन घूमते हुए हमें रात हो गई। हम थे भी बड़े सुनसान इलाके में। और सबको डर भी लग रहा था। तभी मैने idea दिया कि क्यों नहीं हम अपने मोबाइल पर भजन चलाते हुए चलते हैं। इस से डर भी कम लगेगा।
 
सब अभी कुछ कहते मैने जोश में आकर फोन speaker से attach किया। और भजन चला दिये। थोड़ी देर में ही हमें झाड़ियों से छोटे छोटे बल्ब जलते हुए नज़र आने लगे। यह देख कर हम डर गए। क्योंकि वो बल्ब नहीं 4 - 5 जंगली कुत्तों की आंखें थी। 

पहले तो वो हम पर gurayee और फिर हमारे पीछे भागने लग गए। बस क्या था हम सब भी ताबड़तोड़ भागे। चढ़ाई वाला रास्ता था। कई बार गिरे भी। काफी चोटें भी आई। भगवान का शुक्र है कि हम सब पास की एक धर्मशाला में घुस गए। और दरवाजा बंद कर दिया। और सारी रात वहाँ गुजारी, और अगले 2 दिन वहां के हॉस्पिटल में। क्योंकि सबको बहुत चोटें ओर मोच आई थी। 

और मैं मन ही मन यह सोच रहा था कि "मैं ऐसा क्यों हूँ"

Trip की उस रात के बाद मैं अंदर से टूट चुका था। शरीर की चोटें तो ठीक हो गईं, लेकिन दिमाग में एक ही सवाल घूमता रहा

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”
Trip से घर लौटा तो माँ ने मेरी हालत देख ली। उन्होंने बिना कुछ पूछे एक दिन कहा,
"कन्हैया, कल मंदिर चलेंगे।"
मैं मान गया। शायद इसलिए नहीं कि मुझे विश्वास था, बल्कि इसलिए कि मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था।
मंदिर में एक बुज़ुर्ग पंडित जी बैठे थे। माँ ने मेरी कहानी उन्हें नहीं बताई थी, फिर भी उन्होंने मुझे देखते ही कहा,

"बेटा, तुम बुरे नहीं हो… बस तुम्हारी ऊर्जा बहुत तेज़ है।"
मैं चौंक गया।
उन्होंने बताया कि कुछ लोग स्वभाव से ही ज़्यादा भावुक और जोशीले होते हैं। जब वे बिना सोचे-समझे कोई कदम उठाते हैं, तो वही ऊर्जा आसपास के लोगों को नुकसान पहुँचा देती है।

"ये कोई अभिशाप नहीं," पंडित जी बोले, "ये एक ज़िम्मेदारी है।"
मुझे समझ आने लगा
जन्म के समय मेरी मासूम चीख़
बचपन की नासमझी
स्कूल का जोश
कॉलेज का बेवकूफ़ी भरा उत्साह

हर बार गलती मेरे इरादे में नहीं, बल्कि मेरे असंतुलन में थी।
मैं कभी रुका ही नहीं। मैंने कभी सोचा ही नहीं।

उस दिन के बाद मैंने खुद से एक वादा किया
बोलने से पहले रुकूँगा , करने से पहले सोचूँगा, और सबसे ज़रूरी अपने जोश को होश के साथ बाँधूँगा

धीरे-धीरे ज़िंदगी बदलने लगी। अब भी मुश्किलें आती हैं, लेकिन हादसे नहीं।
अंत में यही बताना चाहूंगा।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो खुद से वही सवाल पूछता हूँ
“मैं ऐसा क्यों हूँ?”
और अब मेरे पास जवाब है।
मैं ख़तरनाक नहीं था… मैं बस असंभला हुआ इंसान था।

अगर आपकी ज़िंदगी में भी सब कुछ आपके आसपास बिगड़ता हुआ लगे, तो शायद वजह किस्मत नहीं
आपका जोश हो सकता है।

क्योंकि जब इंसान खुद को समझ लेता है, तब उसकी कहानी हादसों की नहीं,  बदलाव की बन जाती है।

💛 गुरुकृपा 

Thursday, 5 February 2026

वो अधूरा सा इश्क़ | एक खामोश लेकिन दिल छू लेने वाली प्रेम कहानी

 

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शाम के सात बजे थे।
बारिश थम चुकी थी, लेकिन सड़कों पर नमी अभी बाकी थी।

आरव हर रोज़ की तरह उसी बस स्टॉप पर खड़ा था—
हाथ में कॉफ़ी, आँखों में थकान, और दिल में कोई नाम…
जिसे वो कभी ज़ोर से नहीं बोल पाया।

तभी उसे दिखी अनाया।

सफ़ेद दुपट्टा, भीगे बाल, और आँखों में एक अजीब सी खामोशी।
वो पहली बार नहीं थी जब आरव ने उसे देखा था।
पिछले छह महीनों से, वो दोनों उसी बस का इंतज़ार करते थे…
बिना एक-दूसरे से बात किए।

बस आती,
दोनों बैठते,
और खामोशी उनके बीच बैठी रहती।
लेकिन उस दिन कुछ अलग था।

अनाया ने अचानक पूछा—
“अगर किसी से बहुत प्यार हो जाए…
तो क्या उसे बता देना चाहिए?”

आरव चौंक गया।
पहली बार, खामोशी टूटी थी।

वो मुस्कुराया, और बोला—
“अगर वो प्यार सच्चा हो…
तो देर करना गुनाह है।”

अनाया ने खिड़की से बाहर देखा।
आँखें नम थीं।

“कुछ प्यार… मुकम्मल नहीं होते,”
वो धीमे से बोली।

बस स्टॉप आया।
अनाया उतर गई।

आरव उसे रोकना चाहता था,
उससे कहना चाहता था कि
वो वही प्यार है…
जो हर रोज़ उसके साथ सफ़र करता है।

लेकिन शब्द…
हमेशा की तरह, हार गए।

अगले दिन,
बस आई…
आरव आया…

लेकिन अनाया नहीं।

दिन बीते।
हफ्ते गुज़रे।

फिर एक दिन,
बस स्टॉप पर एक ख़त पड़ा था।

“कुछ प्यार कहे नहीं जाते,
लेकिन ज़िंदगी भर साथ चलते हैं।
— अनाया”

आरव मुस्कुराया।
आँखें नम थीं।
वो जान गया था—
प्यार कभी अधूरा नहीं होता…
बस कुछ कहानियाँ मुलाक़ात तक नहीं पहुँच पातीं।

💛 गुरुकृपा 

Tuesday, 3 February 2026

कमरा नंबर 307: गेस्ट हाउस की एक अनसुलझी रहस्यमयी कहानी

 

कमरा नंबर 307 | 3:07 बजे की खौफनाक मिस्ट्री

शहर के पुराने हिस्से में बना “शांति गेस्ट हाउस” बाहर से बिल्कुल साधारण दिखता था।
तीन मंज़िलें।
पीली पड़ चुकी दीवारें।
और सीढ़ियों में अजीब सी खामोशी।

अरुण एक ट्रैवल ब्लॉगर था। उसे पुरानी, अनजानी जगहों पर रुकने का शौक था।
इसी शौक में वह उस गेस्ट हाउस में पहुँचा।

रजिस्टर पर नाम लिखते समय रिसेप्शन पर बैठे बूढ़े आदमी ने बिना सिर उठाए कहा-
“कमरा नंबर 307 मत लेना।”

अरुण मुस्कराया।
“सब लोग यही कहते हैं… तभी तो मज़ा आता है।”
वह माना नहीं, और उसने वही कमरा लिया।
कमरा नंबर 307

कमरा 307 साफ़ था, लेकिन
अजीब तरह से ठंडा।

रात के ठीक 3:07 बजे, अरुण की नींद खुल गई।
दरवाज़े के बाहर किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी।

टक… टक… टक…

फिर आवाज़ रुक गई।
दरवाज़ा नहीं खुला।
बस सन्नाटा।

सुबह उसने रिसेप्शन पर पूछा-
“कल रात कोई ऊपर आया था?”

बूढ़े आदमी ने सिर उठाकर पहली बार उसे देखा।
आँखें डर से भरी थीं।

“कमरा 307 में, कोई नहीं आता साहब।”

अरुण सारे दिन घूमता रहा।
रात को कमरे में गया।
तो उसने देखा कि 
दीवार पर कुछ लिखा है -

“मुझे यहाँ बंद किया गया है।”

अरुण ने सोचा, कोई मज़ाक कर रहा होगा।
उसने मोबाइल से फोटो खींची।

लेकिन फोटो में…
दीवार बिल्कुल खाली थी।

उसी रात फिर 3:07 बजे
आईने में एक परछाईं दिखी।

परछाईं ने धीरे से कहा-
“तुम भी मुझे भूल जाओगे…”

अब अरुण भी सोच में पड़ गया।
यहाँ जरूर कोई बात है।
सारी रात उसे नींद तो आई नहीं।
वो इसके बारे में ही सोचता रहा।

अगली सुबह 
अरुण ने इसके बारे में लोगों से पूछना चाहा।
लेकिन किसी से कुछ पता नहीं चला।
अरुण ने पुरानी फाइलें खंगालीं।
पता चला-

कमरा 307 में 15 साल पहले एक आदमी गायब हुआ था।
नाम था- अजय वर्मा
गेस्ट हाउस का पुराना मालिक।

केस कभी सुलझा नहीं।
कमरा बंद कर दिया गया।

आज अरुण की गेस्ट हाउस में आखिरी रात थी।
रात को आईने में फिर परछाई दिखाई दी।
अरुण ने आईने से कहा-
“तुम अजय हो, है ना?”

आईना टूट गया।

सुबह…
कमरा 307 खाली था।

अरुण का सामान पड़ा था।
मोबाइल, कैमरा, बैग-सब।

बस एक नई एंट्री रजिस्टर में थी-

नाम: अजय वर्मा
कमरा: 307
समय: 3:07

और अरुण…
कभी वापस नहीं मिला।

शांति गेस्ट हाउस आज भी है।
कमरा 307 आज भी बंद है।

और आज भी कोई कमरा नंबर 307 नहीं लेता।

Sunday, 1 February 2026

ऋषि उपमन्यु और भगवान शिव की सच्ची कथा

 भगवान शिव को भोलेनाथ यूँ ही नहीं कहा जाता। वे न पद देखते हैं, न उम्र, न धन—वे केवल सच्चे मन की भक्ति पहचानते हैं। आज हम आपको शिव जी के जीवन से जुड़ी एक ऐसी कथा बता रहे हैं, जो बहुत कम लोगों को पता है, लेकिन शिव भक्ति का सबसे गहरा रूप दिखाती है।


ऋषि उपमन्यु की शिव तपस्या का चित्र, भगवान भोलेनाथ का दिव्य दर्शन

प्राचीन काल में ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र थे उपमन्यु। बचपन से ही उनके हृदय में केवल एक ही नाम बसा था, महादेव।

एक दिन उपमन्यु ने अपने पिता से कहा

“पिताजी, मुझे संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए।
मुझे केवल भगवान शिव चाहिए।”

पुत्र की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए ऋषि व्याघ्रपाद ने उन्हें वन में भेज दिया और कहा
“वहाँ रहकर शिव की उपासना करना।
भोजन या सुख की कोई व्यवस्था नहीं होगी।”

उपमन्यु ने भी प्रण ले लिया कि वह महादेव जी को पाने के लिए कठोर तप करेंगे।

वन में उपमन्यु को न अन्न मिला, न फल।
पहले वे पत्तियाँ खाने लगे, फिर घास, फिर केवल जल।
अंत में जब जल भी नहीं मिला, तब उन्होंने भूखे-प्यासे केवल ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना शुरू कर दिया।

शरीर क्षीण होता गया, पर भक्ति और प्रबल हो गई।

यह देखकर शिवजी ने अपने भक्त की परीक्षा लेने की सोची।

भगवान शिव स्वयं ब्राह्मण का वेश धारण कर उपमन्यु के पास आए और बोले
“बालक, यह कठोर तप क्यों?
किसी अन्य देवता की पूजा कर लो, भोजन और सुख मिल जाएगा।”

उपमन्यु ने अत्यंत शांत स्वर में उत्तर दिया

“यदि शिव नहीं, तो जीवन भी नहीं।
मैं किसी और को नहीं जानता।”

उपमन्यु की यह बात सुनकर भोलेनाथ प्रसन्न हो गए।

महादेव जी का ब्राह्मण रूप लुप्त हो गया और भगवान शिव अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए।
उन्होंने उपमन्यु को उठाया, करुणा से देखा और कहा

“तूने भूख, कष्ट और मृत्यु से भी बड़ा मुझे माना है।
आज मैं तुझसे प्रसन्न हूँ।”

भगवान शिव ने उपमन्यु को दिव्य ज्ञान और पाशुपत अस्त्र प्रदान किया।
उपमन्यु आगे चलकर महान ऋषि बने और जीवन भर शिव भक्ति का प्रचार किया।

💛 गुरुकृपा 

Friday, 30 January 2026

आईना जो रात में ज़िंदा हो जाता है

 कुछ डर ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते…

बस महसूस होते हैं।


✨यह कहानी एक ऐसे आईने की है

जो रात होते ही सांस लेने लगता है।

और उसमें दिखने वाला अक्स…

आपका होकर भी आपका नहीं रहता।✨


डरावनी हिंदी हॉरर कहानी में रात के समय सांस लेता आईना

राजीव के बाथरूम में एक पुराना आईना है।
चौकोर।
किनारों पर जंग।

दिन में वो बिल्कुल सामान्य लगता है।
लेकिन रात को
राजीव उसे ढक कर सोता है।

क्योंकि एक रात
उसने उसे सांस लेते सुना था।

पहली बार
उसने ध्यान नहीं दिया।

नल बंद किया, लाइट बुझाई
और बाहर निकल आया।
लेकिन जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद हुआ

हाऽऽ… हाऽऽ…

धीमी, भारी साँसें।

राजीव जैसे जम गया।

उसने खुद से कहा
पाइप की आवाज़ होगी

अगली रात
उसने आईने पर तौलिया डाल दिया।

3:11 AM
उसकी नींद खुली।

बाथरूम से आवाज़ आ रही थी—
छप… छप…

जैसे कोई गीले हाथों से शीशा रगड़ रहा हो।

वह काँपते हुए उठा।
दरवाज़ा बंद था।

अंदर से उसे, उसी की आवाज़ आई

“तौलिया हटा दो
मुझे ठीक से देखना है।”

राजीव को ऐसा लगा कि 
उसके पैरों से जान निकल गई।

वह पीछे हटने लगा।

तभी
तौलिया अपने आप 
फर्श पर गिर गया।

आईना दिख रहा था।

और उसमें
राजीव खुद खड़ा था।

लेकिन
वह मुस्करा रहा था।

जबकि उसके चेहरे पर
डर ने अपना शिकंजा कसा हुआ था।

आईने वाला “राजीव”
धीरे-धीरे क़रीब आया।

उसने शीशे पर हाथ रखा।
और उसी पल
राजीव के गाल पर
उसे ठंडी उँगलियों का अहसास हुआ।

वह चिल्लाया

“तू कौन है?!”

आईने से जवाब आया

“जो तुम रात में बन जाते हो।”

आईने वाला “राजीव”
अब हँस रहा था।

उसकी आँखें
झपक नहीं रही थीं।
“दिन में तुम ज़िंदा रहते हो,”
“रात में…
मैं।”

अचानक
बाथरूम की लाइट बंद।

अंधेरे में
शीशा टूटने की आवाज़ आई।

सुबह

राजीव को फ़र्श पर होश आया।
आईना टूटा हुआ था।
लेकिन
उसमें खून से
एक लाइन लिखी थी

“अब मुझे शीशे की ज़रूरत नहीं।”

उसी रात
उसकी माँ ने कहा

“तू आजकल
आईने में आँखें झपकाता ही नहीं…”

और सच में…

उसने कोशिश की।
पर
राजीव की पलकें
हिल ही नहीं रहीं थीं।

और कहीं अंदर
कोई बहुत धीरे से
सांस ले रहा था।

💛 गुरुकृपा 

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