एक दोपहर की बात थी। बाज़ार में चहल-पहल सही-सही थी। न ज्यादा कम न ज्यादा। चाय की टपरी पर एक लड़का बैठा हुआ था। चाय पी रहा था। और साथ ही लग रहा था। कि वो किसी का इंतजार कर रहा है। काफी समय बीत गया। वो वहीं बैठा रहा। तभी अचानक बहुत शोर हुआ। सब चिल्लाते हुए एक व्यक्ति के पास दौड़े। वो व्यक्ति अचानक जमीन पर गिर पड़ा।
जब सबने ध्यान दिया तो पता चला कि उसे कोई चाकू मार गया है। उस व्यक्ति को जल्दी से उठाया गया। और पास के हॉस्पिटल में दाखिल किया गया। समय से हॉस्पिटल पहुंचाने के कारण उसकी जान तो बच गई। लेकिन बार-बार एक ही बाजू पर वार करने के कारण उसका सीधा हाथ काम करने लायक नहीं रहा।
उस समय मैं उसी इलाके का थाना प्रभारी था। और यह case मेरे पास ही आया। पहली जांच में तो यह नहीं पता चला कि हमला किसने किया है। लेकिन जब जांच ने जोर पकड़ा। तो पता चला। कि जिस पर हमला हुआ है। वो नजदीक के ऑफिस में बहुत ही ऊंचे पद पर काम करता है।
अब मैं और मेरी टीम इस केस में लग गई। जब घटना स्थल की जांच की गई। तो पता चला की यह घटना उसी चाय की टपरी के पास हुई थी। और लोगों से जो उस समय वहां थे और चायवाले से भी सवाल जवाब हुए। लेकिन चायवाले ने कहा - उस समय वो अपनी टपरी के लिए दूध लेने गया था। फिर मेरी नजर सामने लगी सीसीटीवी कैमरे पर गई। और मैने झट से उसकी recording मंगवाई।
और जब वो recording देखी गई तो साफ-साफ पता चल रहा था। कि इस घटना को अंजाम उसी लड़के ने दिया है। जो चाय की टपरी पर काफी देर से बैठा चाय पी रहा था। चायवाले को बुलाया गया और उससे पूछा गया - कि जब वो दूध लेने गया था। तो क्या वो लड़का वहां था, या जब वो आया तो वो वहां था। अगर नहीं था। तो उसने पुलिस को क्यों नहीं बताया। चायवाला बोला - जब वो गया था तब वो वहां था पर जब वो वापस आया तब वो नहीं था। उसे लगा कि वो भी और लोगों के साथ उस व्यक्ति को हॉस्पिटल ले गया है। मैंने उसे कहा, फिर भी उसे बताना चाहिए था। वो बोला, उसके दिमाग से उतर गया था।
फिर उस लड़के की खोज-बीन शुरू हुई। 2-4 दिन लग गए। लेकिन वो पकड़ा गया। हैरानी की बात थी कि उसने भागने की कोशिश नहीं की। उसे पकड़ लिया गया और जेल में डाल दिया गया।
जेल में जब मैंने उसे देखा तो मुझे पता नहीं क्यों बहुत अजीब लगा। वो देखने में बहुत ही अच्छे घर का लग रहा था। उसकी उम्र भी ज्यादा नहीं थी। एक decent सा haircut, sober वेश भूषा।
खैर मैं जेल में गया उससे बात करने।
मैने पूछा - नाम क्या है तुम्हारा?
वो बोला - मधुर
उम्र - 16 साल
मैंने पूछा - पढ़ते हो
उसने कहा - हां। 11th class
घर पर कौन कौन है?
उसने कहा - मैं, मेरी छोटी बहन, और मां
मैंने पूछा - पापा?
वो बोला - पापा आर्मी में थे। दो साल पहले के terrorist attack में लोगों को बचाते हुए शहीद हो गए।
यह सुनकर मैं सुन्न हो गया। और सोच में पड़ गया कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि इतने अच्छे परिवार का होते हुए भी इस बच्चे को यह कदम उठाना पड़ा।
अभी मैं कुछ कह पाता वो खुद बोला - आप यही सोच रहे हो कि इतनी अच्छी family का होते हुए भी मैने ऐसा क्यों किया। अपनी मां और बहन के बारे में क्यों नहीं सोचा। तो इसका जवाब है मेरे पास। आप जानना चाहेंगे कि जिस आदमी पर मैने हमला किया वो कौन था?
हां मैं......
उसने मेरी बात पूरी भी नहीं करने दी। खुद ही बोल पड़ा। वो मेरी मां के ऑफिस में उनका सीनियर था। एक बात बताएं मेरे पापा लोगों को बचाते हुए शहीद हुए। लोगों की उन्होंने रक्षा की अपनी जान की परवाह न करते हुए, और न ही यह सोचा कि उनके पीछे या उनके बिना उनके परिवार का क्या होगा। और जब उनकी पत्नी को रक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत थी तब कोई काम नहीं आया।
वो आदमी उनका बॉस था। ऊंची पहुंच थी। बड़े-बड़े लोगों में उठना-बैठना था उसका। लेकिन वो आदमी एक नम्बर का गंदा आदमी था। वो आए दिन मेरी मां को तंग करता रहता था। कोई न कोई बहाना बनाकर पास आना, unnecessary touch करना।
और जब मां ने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई या शिकायत की। तो अपने ऊंचे रुतबे, जांच-पहचान के कारण उसे एक warning देकर छोड़ दिया गया।
लेकिन अब वो और ज्यादा मां को परेशान करने लगा। बात - बात पर पैसे काट लेना, डांटना, सब बहुत बढ़ गया था। और यह सब मैं अपनी मां की खामोश, और शर्माती आंखों में देख सकता था।
और मैने सोच लिया कि जब मेरे पिताजी ने किसी गैर की जान की रक्षा के लिए अपने जान की परवाह नहीं की। तो मैं भी उन्हीं का बेटा हूं और इस बार मुझे अपनी मां की रक्षा करनी थी। और मैं नहीं चाहता था कि उस गंदे आदमी के कारण मेरी मां वो नौकरी छोड़े।
और देखिए हुआ वही वो लाचार हो गया अब कभी भी वो उस ऑफिस में नहीं जा पाएगा। और मेरी मां वहीं काम करेंगी। रही इस दुनिया की बात यह कुछ दिन याद रखेगी इस घटना को फिर भूल जाएगी, जैसे मेरे पापा के बलिदान को भूल गई और मुझे यह कदम उठाने पर मजबूर किया और रही मेरी मां की बात वह दुखी होंगी बहुत दुखी होंगी, मेरे भविष्य को लेकर। मगर क्या कर सकते हैं सभी को सब कुछ नहीं मिलता। हां, एक बात जरूर है कि आज के बाद मेरी मां और बहन की ओर कोई गलत नज़र से नहीं देख पाएगा।
मैं यह सब सुनकर बिल्कुल चुप हो गया। मेरे पास उसकी किसी बात का जवाब नहीं था। मैं बस यही कह कर बाहर आ गया कि बेटे जो किया वो सही नहीं था। और नजरे झुकाकर बाहर अपनी टेबल पर आ कर बैठ गया।
और मैंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि मैं इस बच्चे का भविष्य जितना बिगड़ गया है वो तो सुधार नहीं सकता, लेकिन आगे और बिगड़ने नहीं दूंगा। मैंने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया कि वो आदमी मरा नहीं बच गया था।
चार्जशीट तैयार की गई। मुकदमा चला। मैने उसकी मां के ऑफिस की और महिला कर्मचारियों को इस बात के लिए मनाया कि वह गवाही दे। कि वो आदमी बेहद ही गंदा था। और सबसे बड़ी बात सबने साथ भी दिया। मधुर को बाल सुधारगृह भेजा गया। वहां रह कर उसने अपनी पढ़ाई पूरी की। ग्रेजुएट हुआ। डिप्लोमा भी किया। जितना हो सकी मैने उसकी मदद की। उसका अच्छा व्यवहार देखते हुए। उसे जल्द छोड़ दिया गया।
और बाहर आकर वो डॉक्टर या इंजीनियर तो नहीं बन पाया। लेकिन उसने अपना छोटा सा टी-स्टॉल खोल लिया। मॉडर्न लुक के साथ। और मुझे पूरा विश्वास था कि वो और तरक्की करेगा। उसे पता था कि मै उसकी मदद कर रहा था। तभी वो एक दिन अपनी मां और बहन के साथ मेरा धन्यवाद करने आया। उसकी यह बात सुनकर मेरी आँखों में आंसू आ गए। और मैं हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और कहा - कि मैंने जो कुछ भी किया है, तुम्हारी मदद, या तुम्हारे परिवार की देखभाल यह कोई एहसान नहीं है। बल्कि श्रद्धांजलि है उस वीर सैनिक के लिए जो इस देश के लिए शहीद हो गया। अगर समाज पहले जाग गया होता तो यह सब न होता।
💛 गुरुकृपा