मंदिर के बाहर की शाम…
अक्सर वैसी ही होती है।
दीयों की रोशनी, अगरबत्तियों की खुशबू
और लोगों की जल्दी।
सबको कहीं पहुँचना होता है
रुकना, जैसे किसी को सिखाया ही नहीं गया।
सीढ़ियों के पास एक बच्चा बैठा था।
उसके सामने मिट्टी के दीये थे
साफ, करीने से रखे हुए।
वह न आवाज़ देता था,
न किसी को रोकता था।
बस हर थोड़ी देर में
किसी दीये की बत्ती सीधी कर देता।
जैसे उसे भरोसा हो—
जिसे देखना होगा,
वह खुद रुक जाएगा।
लोग आए
दीया जलाया
आगे बढ़ गए।
कुछ ने सिक्का रखा,
कुछ ने सिर झुकाया।
पर किसी ने यह नहीं देखा
कि बच्चा देख क्या रहा है।
मैंने पूछा,
“थक नहीं जाते
यहाँ बैठे-बैठे?”
उसने मेरी तरफ नहीं देखा।
बस बोला-
“थकान तब होती है
जब इंतज़ार बेकार लगे।”
फिर वह लौ को देखने लगा
और बहुत धीरे कहा -
“अंधेरा
डराने के लिए नहीं होता।
वह बस बताता है
कि रोशनी की ज़रूरत है।”
मैंने पूछा,
“घर पर कौन है?”
वह थोड़ा रुका।
फिर बोला -
“माँ हैं
ज़्यादातर चुप रहती हैं।
डॉक्टर कहते हैं -
उम्मीद ज़रूरी है।”
उसने यह ऐसे कहा
जैसे उम्मीद
कोई भारी शब्द नहीं
बल्कि रोज़ का काम हो।
मैंने एक दीया उठाया।
मंदिर में रखा।
लौ पहले काँपी
फिर स्थिर हो गई।
पीछे मुड़कर देखा
बच्चा नहीं था।
दीये वहीं थे।
बस एक दीया
थोड़ा अलग जल रहा था।
थोड़ा तेज़
थोड़ा जिद्दी।
तब समझ आया -
कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में आते हैं
बिना कुछ कहे
और कुछ जला जाते हैं।
हम सोचते हैं
कहानी खत्म हो गई।
पर कुछ लौ
बुझती नहीं।
वे बस
हमारी नज़र से
ओझल हो जाती हैं।
💛 गुरुकृपा
यह कहनी, अगर आपको कहीं रोक गई हो, तो शायद इसका जवाब शब्दों में नहीं, खामोशी में है।
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