शहर के पुराने हिस्से में बना “शांति गेस्ट हाउस” बाहर से बिल्कुल साधारण दिखता था।
तीन मंज़िलें।
पीली पड़ चुकी दीवारें।
और सीढ़ियों में अजीब सी खामोशी।
अरुण एक ट्रैवल ब्लॉगर था। उसे पुरानी, अनजानी जगहों पर रुकने का शौक था।
इसी शौक में वह उस गेस्ट हाउस में पहुँचा।
रजिस्टर पर नाम लिखते समय रिसेप्शन पर बैठे बूढ़े आदमी ने बिना सिर उठाए कहा-
“कमरा नंबर 307 मत लेना।”
अरुण मुस्कराया।
“सब लोग यही कहते हैं… तभी तो मज़ा आता है।”
वह माना नहीं, और उसने वही कमरा लिया।
कमरा नंबर 307
कमरा 307 साफ़ था, लेकिन
अजीब तरह से ठंडा।
रात के ठीक 3:07 बजे, अरुण की नींद खुल गई।
दरवाज़े के बाहर किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी।
टक… टक… टक…
फिर आवाज़ रुक गई।
दरवाज़ा नहीं खुला।
बस सन्नाटा।
सुबह उसने रिसेप्शन पर पूछा-
“कल रात कोई ऊपर आया था?”
बूढ़े आदमी ने सिर उठाकर पहली बार उसे देखा।
आँखें डर से भरी थीं।
“कमरा 307 में, कोई नहीं आता साहब।”
अरुण सारे दिन घूमता रहा।
रात को कमरे में गया।
तो उसने देखा कि
दीवार पर कुछ लिखा है -
“मुझे यहाँ बंद किया गया है।”
अरुण ने सोचा, कोई मज़ाक कर रहा होगा।
उसने मोबाइल से फोटो खींची।
लेकिन फोटो में…
दीवार बिल्कुल खाली थी।
उसी रात फिर 3:07 बजे
आईने में एक परछाईं दिखी।
परछाईं ने धीरे से कहा-
“तुम भी मुझे भूल जाओगे…”
अब अरुण भी सोच में पड़ गया।
यहाँ जरूर कोई बात है।
सारी रात उसे नींद तो आई नहीं।
वो इसके बारे में ही सोचता रहा।
अगली सुबह
अरुण ने इसके बारे में लोगों से पूछना चाहा।
लेकिन किसी से कुछ पता नहीं चला।
अरुण ने पुरानी फाइलें खंगालीं।
पता चला-
कमरा 307 में 15 साल पहले एक आदमी गायब हुआ था।
नाम था- अजय वर्मा
गेस्ट हाउस का पुराना मालिक।
केस कभी सुलझा नहीं।
कमरा बंद कर दिया गया।
आज अरुण की गेस्ट हाउस में आखिरी रात थी।
रात को आईने में फिर परछाई दिखाई दी।
अरुण ने आईने से कहा-
“तुम अजय हो, है ना?”
आईना टूट गया।
सुबह…
कमरा 307 खाली था।
अरुण का सामान पड़ा था।
मोबाइल, कैमरा, बैग-सब।
बस एक नई एंट्री रजिस्टर में थी-
नाम: अजय वर्मा
कमरा: 307
समय: 3:07
और अरुण…
कभी वापस नहीं मिला।
शांति गेस्ट हाउस आज भी है।
कमरा 307 आज भी बंद है।
और आज भी कोई कमरा नंबर 307 नहीं लेता।

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