Sunday, 1 February 2026

ऋषि उपमन्यु और भगवान शिव की सच्ची कथा

 भगवान शिव को भोलेनाथ यूँ ही नहीं कहा जाता। वे न पद देखते हैं, न उम्र, न धन—वे केवल सच्चे मन की भक्ति पहचानते हैं। आज हम आपको शिव जी के जीवन से जुड़ी एक ऐसी कथा बता रहे हैं, जो बहुत कम लोगों को पता है, लेकिन शिव भक्ति का सबसे गहरा रूप दिखाती है।


ऋषि उपमन्यु की शिव तपस्या का चित्र, भगवान भोलेनाथ का दिव्य दर्शन

प्राचीन काल में ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र थे उपमन्यु। बचपन से ही उनके हृदय में केवल एक ही नाम बसा था, महादेव।

एक दिन उपमन्यु ने अपने पिता से कहा

“पिताजी, मुझे संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए।
मुझे केवल भगवान शिव चाहिए।”

पुत्र की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए ऋषि व्याघ्रपाद ने उन्हें वन में भेज दिया और कहा
“वहाँ रहकर शिव की उपासना करना।
भोजन या सुख की कोई व्यवस्था नहीं होगी।”

उपमन्यु ने भी प्रण ले लिया कि वह महादेव जी को पाने के लिए कठोर तप करेंगे।

वन में उपमन्यु को न अन्न मिला, न फल।
पहले वे पत्तियाँ खाने लगे, फिर घास, फिर केवल जल।
अंत में जब जल भी नहीं मिला, तब उन्होंने भूखे-प्यासे केवल ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना शुरू कर दिया।

शरीर क्षीण होता गया, पर भक्ति और प्रबल हो गई।

यह देखकर शिवजी ने अपने भक्त की परीक्षा लेने की सोची।

भगवान शिव स्वयं ब्राह्मण का वेश धारण कर उपमन्यु के पास आए और बोले
“बालक, यह कठोर तप क्यों?
किसी अन्य देवता की पूजा कर लो, भोजन और सुख मिल जाएगा।”

उपमन्यु ने अत्यंत शांत स्वर में उत्तर दिया

“यदि शिव नहीं, तो जीवन भी नहीं।
मैं किसी और को नहीं जानता।”

उपमन्यु की यह बात सुनकर भोलेनाथ प्रसन्न हो गए।

महादेव जी का ब्राह्मण रूप लुप्त हो गया और भगवान शिव अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए।
उन्होंने उपमन्यु को उठाया, करुणा से देखा और कहा

“तूने भूख, कष्ट और मृत्यु से भी बड़ा मुझे माना है।
आज मैं तुझसे प्रसन्न हूँ।”

भगवान शिव ने उपमन्यु को दिव्य ज्ञान और पाशुपत अस्त्र प्रदान किया।
उपमन्यु आगे चलकर महान ऋषि बने और जीवन भर शिव भक्ति का प्रचार किया।

💛 गुरुकृपा 

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