कुछ डर ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते…
बस महसूस होते हैं।
✨यह कहानी एक ऐसे आईने की है
जो रात होते ही सांस लेने लगता है।
और उसमें दिखने वाला अक्स…
आपका होकर भी आपका नहीं रहता।✨
राजीव के बाथरूम में एक पुराना आईना है।
चौकोर।
किनारों पर जंग।
दिन में वो बिल्कुल सामान्य लगता है।
लेकिन रात को
राजीव उसे ढक कर सोता है।
क्योंकि एक रात
उसने उसे सांस लेते सुना था।
पहली बार
उसने ध्यान नहीं दिया।
नल बंद किया, लाइट बुझाई
और बाहर निकल आया।
लेकिन जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद हुआ
हाऽऽ… हाऽऽ…
धीमी, भारी साँसें।
राजीव जैसे जम गया।
उसने खुद से कहा
पाइप की आवाज़ होगी
अगली रात
उसने आईने पर तौलिया डाल दिया।
3:11 AM
उसकी नींद खुली।
बाथरूम से आवाज़ आ रही थी—
छप… छप…
जैसे कोई गीले हाथों से शीशा रगड़ रहा हो।
वह काँपते हुए उठा।
दरवाज़ा बंद था।
अंदर से उसे, उसी की आवाज़ आई
“तौलिया हटा दो
मुझे ठीक से देखना है।”
राजीव को ऐसा लगा कि
उसके पैरों से जान निकल गई।
वह पीछे हटने लगा।
तभी
तौलिया अपने आप
फर्श पर गिर गया।
आईना दिख रहा था।
और उसमें
राजीव खुद खड़ा था।
लेकिन
वह मुस्करा रहा था।
जबकि उसके चेहरे पर
डर ने अपना शिकंजा कसा हुआ था।
आईने वाला “राजीव”
धीरे-धीरे क़रीब आया।
उसने शीशे पर हाथ रखा।
और उसी पल
राजीव के गाल पर
उसे ठंडी उँगलियों का अहसास हुआ।
वह चिल्लाया
“तू कौन है?!”
आईने से जवाब आया
“जो तुम रात में बन जाते हो।”
आईने वाला “राजीव”
अब हँस रहा था।
उसकी आँखें
झपक नहीं रही थीं।
“दिन में तुम ज़िंदा रहते हो,”
“रात में…
मैं।”
अचानक
बाथरूम की लाइट बंद।
अंधेरे में
शीशा टूटने की आवाज़ आई।
सुबह
राजीव को फ़र्श पर होश आया।
आईना टूटा हुआ था।
लेकिन
उसमें खून से
एक लाइन लिखी थी
“अब मुझे शीशे की ज़रूरत नहीं।”
उसी रात
उसकी माँ ने कहा
“तू आजकल
आईने में आँखें झपकाता ही नहीं…”
और सच में…
उसने कोशिश की।
पर
राजीव की पलकें
हिल ही नहीं रहीं थीं।
और कहीं अंदर
कोई बहुत धीरे से
सांस ले रहा था।
💛 गुरुकृपा

Wah pooh keep going 🫶🏻🫶🏻
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