मेरा नाम कन्हैया है। आज में आपके साथ अपनी कहानी साझा करना चाहता हूँ। आप भी कहेंगे कि मेरी कहानी में ऐसा क्या है जो पढ़ा जाये। तो मेरा कहना है कि जनाब एक बार पढ़िए तो सही बार बार पढ़ने का मन करेगा।
तो फिर ऐसा है कि शुरू करते हैं।
नाम जैसे ही पहले बताया है आपको
हमारा कन्हैया है।
हम एक middle class family में पैदा हुए।
हमारा जनम हमारी 2 बहनों के बाद हुआ।
यही कारण था कि हम जरा ज्यादा ही लाडले थे।
कहानी शुरू से शुरू करते है।
बात है। हमारे जन्म की। हमारी माँ हॉस्पिटल के operation theatre में थी। हमारे आने की तैयारी हो रही थी। सब बढ़िया से हो रहा था। जैसे ही हम इस दुनिया में आए। और जैसे ही पहली बार रोये।
वहां खड़ी एक sister जल्दी मे डॉक्टर के पास आने के लिए जैसे ही बढ़ी। उसका पैर फिसला और वो गिर गई। उनके हाथ में facture हो गया। और वो 3 महीने की छुट्टी पर चली गई।
इस घटना को सबने उनकी लापरवाही या किस्मत समझा।
मेरे घर में तो खुशियों का माहौल था। धीरे धीरे समय बीतता गया।
अब मैं 1 साल का हो गया था। लड़खड़ा कर चलना शुरू कर दिया था मैंने। एक फोन मै ऐसे ही चल रहा था। मेरे दादा जी जमीन पर लेटे हुए थे। और उनके सर के पास पर गर्म चाय टेबल पर पड़ी थी।
जैसे ही मैं उनके पास पहुंचा। मैं लड़खड़ाया मेरा हाथ टेबल पर लगा और चाय दादाजी के सर पर गिर गई। वो दर्द से चिल्लाते हुए उठ गए। सभी घर के लोग एकत्रित हो गए। और इस घटना को भी अचानक हुई घटना का नाम दिया गया। और मुझे बहुत प्यार किया गया।
फिर जब मैं school कि 5वी class में पहुंचा। तो मेरी class में फंक्शन की तैयारी हो रही थी। नाटक की रिहर्सल चल रही थी।
नाटक की तैयारी क्लॉस में चल रही थी।
सीन यह था कि एक लड़के को झण्डे को ऊपर उठा कर हिलाना था। जो लड़का झण्डे देने के लिए खड़ा था। वो अचानक झंडा वही छोड़ कर चला गया था। और मैं वही खड़ा था। पहले नाटक नीचे खड़े होकर हो रहा था। और इशारा मिलते ही वो झंडा उसे देना था। और उसे वो लहराना था।
रिहर्सल जोर शोर से हो रही थी। उस लड़के की height छोटी थी। तो टीचर ने उसे बेंच के ऊपर खड़े हो कर एक्टिंग करने को कहा। और पंखा भी बिल्कुल उसके ऊपर था। इस बार उसे झंडे के बिना एक्टिंग करनी थी। क्योंकि ऊपर पंखा था।
लेकिन हुआ यह सब उत्साह में एक्टिंग कर रहे थे। मैं भी उसके पास खड़ा हो गया। और जोश जोश में मैने उसे वो झंडा पकड़ा दिया। और उसने भी लहरा दिया।
फिर क्या हुआ। झंडा टकराया पंखे से, लड़का बहुत पतला था। पंखा high speed में चल रहा था। झटके से वो लड़का दूर जाकर गिरा। और उसे बहुत सी चोटे आई। और उस दिन मुझे बहुत डांट पड़ी। स्कूल से भी, और घर में भी। वो पहली बार घर में सबने notice किया। कि जब हम जोश में होते है। तो दूसरे के साथ बुरा होता है। हमें संभल कर रहने की हिदायत दी गई।
हम भी संभल कर चले। समय बीतता गया। अब हम college में आ गए। हमने जोश से नहीं होश से काम लेना शुरू कर दिया था।
College की तरफ से हमें trip में ले जाया जा रहा था। हम सब hill station जा रहे थे। 3 , 4 दिन का ट्रीप था। एक दिन घूमते हुए हमें रात हो गई। हम थे भी बड़े सुनसान इलाके में। और सबको डर भी लग रहा था। तभी मैने idea दिया कि क्यों नहीं हम अपने मोबाइल पर भजन चलाते हुए चलते हैं। इस से डर भी कम लगेगा।
सब अभी कुछ कहते मैने जोश में आकर फोन speaker से attach किया। और भजन चला दिये। थोड़ी देर में ही हमें झाड़ियों से छोटे छोटे बल्ब जलते हुए नज़र आने लगे। यह देख कर हम डर गए। क्योंकि वो बल्ब नहीं 4 - 5 जंगली कुत्तों की आंखें थी।
पहले तो वो हम पर gurayee और फिर हमारे पीछे भागने लग गए। बस क्या था हम सब भी ताबड़तोड़ भागे। चढ़ाई वाला रास्ता था। कई बार गिरे भी। काफी चोटें भी आई। भगवान का शुक्र है कि हम सब पास की एक धर्मशाला में घुस गए। और दरवाजा बंद कर दिया। और सारी रात वहाँ गुजारी, और अगले 2 दिन वहां के हॉस्पिटल में। क्योंकि सबको बहुत चोटें ओर मोच आई थी।
और मैं मन ही मन यह सोच रहा था कि "मैं ऐसा क्यों हूँ"
Trip की उस रात के बाद मैं अंदर से टूट चुका था। शरीर की चोटें तो ठीक हो गईं, लेकिन दिमाग में एक ही सवाल घूमता रहा
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”
Trip से घर लौटा तो माँ ने मेरी हालत देख ली। उन्होंने बिना कुछ पूछे एक दिन कहा,
"कन्हैया, कल मंदिर चलेंगे।"
मैं मान गया। शायद इसलिए नहीं कि मुझे विश्वास था, बल्कि इसलिए कि मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था।
मंदिर में एक बुज़ुर्ग पंडित जी बैठे थे। माँ ने मेरी कहानी उन्हें नहीं बताई थी, फिर भी उन्होंने मुझे देखते ही कहा,
"बेटा, तुम बुरे नहीं हो… बस तुम्हारी ऊर्जा बहुत तेज़ है।"
मैं चौंक गया।
उन्होंने बताया कि कुछ लोग स्वभाव से ही ज़्यादा भावुक और जोशीले होते हैं। जब वे बिना सोचे-समझे कोई कदम उठाते हैं, तो वही ऊर्जा आसपास के लोगों को नुकसान पहुँचा देती है।
"ये कोई अभिशाप नहीं," पंडित जी बोले, "ये एक ज़िम्मेदारी है।"
मुझे समझ आने लगा
जन्म के समय मेरी मासूम चीख़
बचपन की नासमझी
स्कूल का जोश
कॉलेज का बेवकूफ़ी भरा उत्साह
हर बार गलती मेरे इरादे में नहीं, बल्कि मेरे असंतुलन में थी।
मैं कभी रुका ही नहीं। मैंने कभी सोचा ही नहीं।
उस दिन के बाद मैंने खुद से एक वादा किया
बोलने से पहले रुकूँगा , करने से पहले सोचूँगा, और सबसे ज़रूरी अपने जोश को होश के साथ बाँधूँगा
धीरे-धीरे ज़िंदगी बदलने लगी। अब भी मुश्किलें आती हैं, लेकिन हादसे नहीं।
अंत में यही बताना चाहूंगा।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो खुद से वही सवाल पूछता हूँ
“मैं ऐसा क्यों हूँ?”
और अब मेरे पास जवाब है।
मैं ख़तरनाक नहीं था… मैं बस असंभला हुआ इंसान था।
अगर आपकी ज़िंदगी में भी सब कुछ आपके आसपास बिगड़ता हुआ लगे, तो शायद वजह किस्मत नहीं
आपका जोश हो सकता है।
क्योंकि जब इंसान खुद को समझ लेता है, तब उसकी कहानी हादसों की नहीं, बदलाव की बन जाती है।
💛 गुरुकृपा

Very nice story
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