Wednesday, 21 January 2026

पहली कमाई, सबसे बड़ा सबक: एक बेटे के अल्हड़ से समझदार बनने का सफ़र

 

“बेटे की समझदारी और पिता की खामोश कुर्बानी दर्शाता दृश्य”


    मैं आज बहुत खुश था। क्योंकि आज मेरी पहली जॉब लग गयी थी। इतनी मेहनत करने के बाद मुझे मेरी dream job मिल गयी थी। Salary भी अच्छी थी। बस क्या था। मै बहुत खुश था। मैने सोचा कि अब मैं वो सब सपने पूरे करूँगा। जो अब तक पूरे नहीं हो पाए थे।
     घर पर भी सब बहुत खुश थे। मैंने जॉब् पर जाना शुरु कर दिया था। आने-जाने के पैसे, अपने खर्च के लिए जो भी पैसे थे। वो इस बार तो पापा ने दिये। मगर मन में कहीं न कहीं यह संतुष्टि थी। कि अगली बार से यह पैसे पापा को नहीं देने पड़ेंगे। बल्कि मैं पापा का घर खर्च में हाथ बटाऊंगा।
      दो - तीन दिन बीत गये। एक दिन सभी दोस्तोँ ने कहीं घूमने का program बनाया। मैने भी हामी भर दी। और सब घूमने के लिए निकल पड़े। घुमते - घूमते रात हो गयी थी। सब आपस में बैठकर बाते कर रहे थे। बात करते हुए सब अपने बचपन की बाते कर रहे थे। मैं भी अपने बचपन की बातें करने लगा। बातों - बातों में, मैंने कहा कि बचपन में ऐसा नहीं था। कि मेरी जरूरतें पूरी नहीं होती थी। लेकिन मनचाही चीजें बहुत ही कम मिल पाती थी. मैं कब से अपने पापा से मेरा dream phone दिलाने के लिए कह रहा था। लेकिन देखो अभी तक मेरे पास नहीं है।ऐसे ही जब सबके पास कार थी। तब भी और अब भी हमारे पास कार नहीं है। मेरी यह बातें सुनकर मेरे दोस्तों ने कहा - कि अब खुद कमा रहे हो, सब शौक पूरे कर लेना. बस यही बातें करते हुए कब हम घर पहुंच गये। पता ही नहीं चला. और सच कहूं उस दिन बहुत मज़ा आया। दिल का गुबार निकाल कर।

      पहला महीना बीता। और अगले महीने की पहली तारीख को मेरी पहली salary आई । मैं बहुत खुश कि आज मेरे पास मेरी कमाई थी। जैसे मर्जी वैसे खर्च करूंगा। यह सोचकर मैं बहुत खुश था। मैंने घर आते हुए। अपने पहले सपने को पूरा करने का सोचा। और market में रुक कर उस फोन की कीमत पूछी। तो मेरे तोते ही उड़ गए। उसकी कीमत मेरी salary से दुगुनी थी। मैं चुपचाप दुकान से बाहर निकल आया। और फिर सोचने लगा कि काश पापा उस समय ले लेते तो इतना महंगा नहीं होता। खैर कोई नहीं 2 salary मिला कर ले लूंगा। यह सोचकर मैं घर आ गया।
घर आकर देखा तो दीदी जीजाजी घर आए हुए थे। उन सब से मिलकर बहुत अच्छा लगा। मैंने सबको अपनी पहली salary बताई। मां ने सबसे पहले भगवान जी के चरणों में उसे रखा। यह हमारे घर में शुरू से था। जब पापा या दीदी की भी salary आती थी। मां सबसे पहले भगवान जी के चरणों में रखती थी।
       मेरे आते ही दीदी जीजाजी घर जाने की जल्दी करने लगे। मुझे बहुत अजीब लगा। क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। जब बहुत ज़ोर दिया। तो पापा ने बताया- कि दीदी को एक साथ बहुत पैसे की जरूरत आ पड़ी थी। पापा ने तो अपनी आधे से ज्यादा पेंशन दीदी को दे दी थी। पर अभी भी पैसे पूरे नहीं पड़ रहे थे।
मेरी पहली salary थी। इसलिए कोई मुझे कह नहीं रहा था। मैंने दीदी से कहा - यह क्या बात हुई दीदी मैं आपका बड़ा न सही छोटा सही पर भाई हूं। और भगवान की दया से अच्छा कमा भी रहा हूं। इसलिए चिन्ता की जरूरत नहीं। फिर मैने भी अपनी सैलरी से अपने daily expenses निकाल कर सारे पैसे दीदी को दे दिए। और जब मैं यह कर रहा था। तो मुझे proud भी feel हुआ। और अपनी सोच पर शर्मिंदगी भी।

     क्योंकि मेरे मन में यह बात चल रही थी। कि मैंने दीदी की समय रहते मदद की। साथ यह भी एहसास हुआ कि अभी मैं अपने dream phone की कीमत पूछ कर आया था। ओर अगले महीने लेने वाला था। लेकिन अचानक आए इस खर्चे के कारण नहीं ले पाऊंगा। और यही शायद पापा के साथ होता होगा। क्योंकि वो उस वक्त अकेले कमाने वाले थे। उन पर हम दोनों भाई-बहन, हमारे दादा - दादी सबका खर्चा था। और यही वो स्थिति होती है। जहां जरूरतों की priority को देखकर जरूरत पूरी की जाती है। जो अधिक जरूरी है वो पहले। बाकी सब बाद में या जब समय आएगा तब। मुझे यह भी ध्यान है। कि पापा ने खुद काफी समय तक keypad mobile use किया था। मुझे और दीदी को smartphone लेकर दिए थे। और रही कार तो हमारे middle class families में कहा जाता है कि "हाथी बांधना, और पालने" में बहुत फर्क होता है। 
कोई नहीं अब मैं भी कमा रहा था और अब यह हाथी हमारे लिए affordable हो गया था। पापा जैसे ही दीदी को बाहर तक छोड़ कर वापस आए। मैंने उन्हें जोर से गले लगा लिया। और धीरे से लेकिन दिल की गहराइयों से उन्हें sorry कहा। पापा ने कहा - क्या हुआ।
मै बोला - आज जिंदगी का बहुत बड़ा सबक सीख लिया। पापा ने सुना और मुस्कराने लगे। और मां से कहा हमारा बेटा समझदार हो गया है।
      ऐसे ही 4 - 5 महीने बीत गए। दीदी ने 2 महीने बाद ही सारे पैसे लौटा दिए। बहुत मन किया। पर जीजाजी नहीं माने।
एक साल बीत गया। मां - पापा की शादी की सालगिराह थी। पापा ने दीदी जीजाजी को भी घर बुलाया था। मुझे नहीं पता था। मैं शाम को घर पहुंचा। मैने मां - पापा को एक लिफाफा दिया। और कहा कि letter box में यह आपके नाम का लेटर आया हुआ है। आपने देखा नहीं। पापा ने जैसे ही लिफाफा खोला। उसमें से गाड़ी की चाबी निकली। मैंने कहा - यह आपकी सालगिरह का तोहफ़ा है। मां हंसी और कहा - हमारे पास भी तुम्हारा return gift hai आंख बंद करो। और मेरे हाथ में मेरा dream phone with latest version था। पापा ने कहा - तुम्हारी दीदी जीजाजी को भी उनका गिफ्ट मिल गया है।
आज मैं बहुत खुश था। क्योंकि मेरा सबसे बड़ा सपना मेरे मां - पापा ने ही पूरा किया।

     आखिर में एक बात अपने सभी पाठकों से कहूंगी कि चाहे कोई सी भी genration हो। कुछ चीजें हमारी कमाई से हमेशा दोगुनी कीमत की होती हैं। उनके लिए सही समय का इंतजार और सब्र करना हमेशा अच्छा होता है। 

💛 गुरुकृपा 

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