श्रृंखला की दूसरी कहानी – एक सीख
नमस्कार दोस्तों,
यह उस पिछली कहानी का दूसरा रुख है। बात तब की है, जब मैं एक क्लीनिक में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करती थी। सर्दियों के दिन थे और हमारे डॉक्टर दो–तीन दिनों की छुट्टी पर थे। क्लीनिक तो हमें खोलना ही होता था, और अगर कोई इमरजेंसी आ जाए, तो दूसरे डॉक्टर को रैफर करना पड़ता था।
मेरी शाम की शिफ्ट रहती थी और मैं आमतौर पर रात 9 बजे तक फ्री हो जाती थी। उस दिन भी मैं अकेली ही थी, क्योंकि हेल्पर भी छुट्टी पर था।
करीब 8:45 बज रहे थे, मैं अपने टेबल पर दिनभर की फाइलें समेट रही थी। डॉक्टर का केबिन मेरे ठीक सामने था, और पीने का पानी का डिस्पेंसर बाहर क्लीनिक के गेट के पास। माहौल शांत था, जैसा कि रात में क्लीनिक में अक्सर होता है।
उसी समय अचानक दरवाज़ा खुला और एक थकी-हारी, गरीब सी प्रेग्नेंट महिला अपनी तीन बेटियों और एक बेटे के साथ अंदर आई। अंदर आते ही वह जोर-जोर से बोली—
“मुझे डॉक्टर से मिलना है!”
फिर बेचैनी में इधर-उधर टहलने लगी।
मैंने उसे शांत कराते हुए कहा कि डॉक्टर छुट्टी पर हैं, लेकिन अगर उसे कोई समस्या है तो मैं दूसरे डॉक्टर का नंबर दे देती हूँ। पर वह जैसे सुन ही नहीं रही थी। उल्टा वह डॉक्टर के केबिन में घुसने की कोशिश करने लगी।
फिर बोली—
“मुझे कुछ नहीं दिखवाना, मेरी बेटी की जाँघ पर चोट है, आप ही देख लो।”
मैंने कहा कि मैं मेडिकल जांच नहीं कर सकती, पर वो ज़िद पर उतरी थी।
जब उसे लगा कि मैं उसे केबिन में नहीं जाने दूँगी, तो उसने अचानक अपनी बेटी की तरफ इशारा किया। वो लड़की मेरे
पास आई और बोली—
“दीदी, पानी दे दो।”
मैंने कहा—बाहर डिस्पेंसर है, वहाँ से ले लो।
इस पर उसकी माँ बोली—
“इससे पानी लेना नहीं आता, प्लीज़ इसे पानी दे दो।”
उसकी यह बात सुनकर मेरे मन में एक ही विचार आया—
"अगर कोई अमीर मरीज होता, तो क्या मैं खुद जाकर उसे पानी नहीं देती? तो फिर यह गरीब है तो क्यों न दूँ?"
इंसानियत ने दिल में दस्तक दी और मैं पानी लेने बाहर निकल गई।
लेकिन जैसे ही मैं बाहर पहुँची, उसकी दूसरी बेटी मेरे पीछे आकर मुझे जैसे रोकने लगी। वह रास्ता ब्लॉक करने की कोशिश कर रही थी। यह मुझे बहुत अटपटा लगा।
मुझे एकदम से कुछ गड़बड़ महसूस हुई।
मैंने उसे हटाया और तुरंत अंदर लौट आई।
अंदर जो देखा, वह चौकाने वाला था—
वह महिला और उसके बच्चे डॉक्टर के केबिन और मेरे रिसेप्शन टेबल पर सब चीज़ें टटोल रहे थे।
मैं जोर से चिल्लाई तो वे सब डरकर भाग गए।
सबसे पहले मैंने डॉक्टर का केबिन चेक किया—सौभाग्य से सब कुछ ठीक था।
लेकिन जैसे ही मैंने अपना टेबल देखा, मेरा पर्स गायब था।
मेरा बैग बड़ा था, इसलिए निकलते समय उनके हाथ में पर्स मैंने नोटिस नहीं किया। बाद में समझ आया—
उस औरत ने मेरा पर्स अपने पेट में छिपाकर ले गई थी।
मैं बाहर भागकर गई, आसपास पूछा, पर तब तक वह बहुत दूर निकल चुकी थी।
मैंने सर के घर फोन किया। उनके पिताजी और भाई तुरंत आए और बोले,
“अब हम देख लेंगे, तुम घर जाओ।”
जब मैं घर की तरफ चल रही थी, तो बस एक ही बात मन में
घूम रही थी—
क्या मेरी गलती सिर्फ यह थी कि मैंने उसे गरीब समझकर पानी देने में देर नहीं की?
क्या इंसानियत दिखाना गलत था?
खैर…
यह भी एक सबक ही था कि दुनिया में हर किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
नेकी करना अच्छी बात है, लेकिन सतर्क रहना उससे भी ज़रूरी है।
आप लोग क्या सोचते हैं?
कमेंट में ज़रूर बताइए।
धन्यवाद।

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