Thursday, 8 January 2026

खामोश दराज़



शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटी-सी सिलाई की दुकान थी—

“नज़ाकत टेलर्स”। दुकान जितनी साधारण थी, उसकी मालकिन मीरा भी उतनी ही चुप रहने वाली।

मीरा समय पर दुकान खोलती,

ग्राहकों के कपड़े नापती

और शाम को ऊपर वाले कमरे में चली जाती।

किसी से ज़्यादा बात नहीं,

किसी से शिकायत नहीं।

एक दिन मोहल्ले में खबर फैल गई

मीरा की दुकान की दराज़ से

रोज़ पैसे गायब हो रहे हैं।

ना ताला टूटा था,

ना कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती।

पुलिस आई, सवाल पूछे और चली गई।

मामला छोटा था।

लेकिन सामने चाय की दुकान चलाने वाला अनिल

एक बात नोटिस कर चुका था।

पैसे वही गायब होते थे

जिन नोटों पर मीरा

पेंसिल से छोटा-सा निशान लगाती थी।

अनिल ने पूछ लिया।

मीरा ने पहले टालने की कोशिश की,

फिर धीमे से बोली -

“ये पैसे मैं किसी ज़रूरतमंद के लिए अलग रखती हूँ।

सीधे देने में डर लगता है -

इसलिए दराज़ में छोड़ देती हूँ।”

अगले कुछ दिनों में

अनिल ने एक बच्चे को देखा।

वही बच्चा जो अक्सर दुकान साफ़ करने में मदद करता था,

और देर तक दराज़ के पास खड़ा रहता था।

उसके जूते फटे थे।

और आँखों में घबराहट थी।

धीरे-धीरे बात खुली।

बच्चे की माँ बीमार थी।

पैसे नहीं थे।

वह नोट उठा लेता था

यह सोचकर कि

“अगर किसी को ज़रूरत होगी तो वो रोक लेगा।”

अनिल ने यह बात मीरा को बताई।

मीरा देर तक चुप रही।

फिर उसी रात

उसने दराज़ में एक छोटा-सा काग़ज़ रख दिया।

उस पर लिखा था

“अगर मजबूरी है, तो ले लेना।

डरने की ज़रूरत नहीं।

जब हालात ठीक हों, लौटाना भी ज़रूरी नहीं।”

अगले कई दिनों तक

दराज़ में सब कुछ वैसा ही रहा।

पैसे न कम हुए, न बढ़े।

फिर एक सुबह

मीरा ने दुकान खोली तो

दराज़ में एक लिफ़ाफ़ा रखा था।

अंदर वही नोट थे

पूरे, गिने हुए।

साथ में एक पर्ची

“अब माँ ठीक है।

स्कूल फिर शुरू हो गया है।

ये पैसे मेरे नहीं थे,

लेकिन आपकी चुप्पी ने

मुझे चोर नहीं बनने दिया।”

मीरा की आँखें भर आईं।

उसने पैसे फिर से दराज़ में रख दिए

अपने लिए नहीं,

किसी और के लिए।


उस दिन मीरा ने समझा-

कभी-कभी

अपराध रोकने के लिए

ताले नहीं,

भरोसा चाहिए।


और कुछ जाँचें

सच पकड़ने के लिए नहीं,

इंसान बचाने के लिए होती हैं।

💛 गुरुकृपा 



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