सुनीता को कोई मारता नहीं था।
इसीलिए सब कहते थे -“तुम बहुत खुशकिस्मत हो।”
अमित न शराब पीता था,
न गाली देता था,
न हाथ उठाता था।
वो बस
सुनीता को देखता नहीं था।
सुबह की चाय बनती,
अक्सर ठंडी हो जाती।
अमित मोबाइल में डूबा रहता,
और सुनीता दिन भर की जिम्मेदारियों में।
बच्चों की स्कूल मीटिंग,
घर का राशन,
माँ की दवाइयाँ,
और अपनी थकान
सब कुछ उसी के नाम।
कभी उसने हिम्मत करके कहा,
“आज मन ठीक नहीं है।”
अमित ने बिना देखे कहा -
“हर किसी का मन खराब होता है।
इतना मत सोचा करो।”
वो चुप हो गई।
क्योंकि उसे सिखाया गया था
कि अच्छी पत्नियाँ ज्यादा बोलती नहीं।
मायके में माँ पूछती -
“सब ठीक है?”
सुनीता मुस्कुरा देती।
क्योंकि समाज को
सच्चाई से ज़्यादा
मुस्कान चाहिए।
एक दिन बेटी ने पूछा. -
“मम्मी, पापा आपसे ऐसे बात क्यों नहीं करते
जैसे दूसरे पापा करते हैं?”
वो सवाल
पहली बार
सुनीता की चुप्पी तक पहुँच गया।
उस रात
उसने रोना नहीं चुना।
उसने हल ढूँढना चुना।
सुनीता को पहली बार बहुत बुरा लगा।
इसलिए नहीं कि अमित उस पर ध्यान नहीं देता
बल्कि इसलिए कि उसकी बेटी ने नोटिस कर लिया था।
उसे डर लगा।
अगर आज वो चुप रही,
तो कल उसकी बेटी
शायद इसी घुटन को
“नॉर्मल” समझ कर जीने लगेगी।
उस रात
सुनीता सोई नहीं।
पहली बार उसने ये नहीं सोचा
कि शादी कैसे बचेगी
उसने सोचा,
उसकी बेटी क्या सीखेगी।
उसने तय किया
कुछ न कुछ करना होगा।
अगले दिन
उसने एक काउंसलर से बात की।
काउंसलर ने शांति से कहा -
“आप अपने पति के साथ आइए।
बात दोनों से होगी।”
अब असली मुश्किल शुरू हुई।
अमित से बात करना
वैसे भी आसान नहीं था।
जो आदमी उसकी बात सुनता ही नहीं,
वो उसकी परेशानी
कैसे समझेगा?
जब सुनीता ने कहा -
“हमें मैरिज काउंसलर से मिलना चाहिए,”
अमित हँस पड़ा।
“ये सब ढकोसला है,”
उसने कहा।
“हमारी शादी में क्या कमी है?
दो बच्चे हैं, घर है, सब ठीक है।
ये सब दिमाग से निकाल दो।”
पहली बार
सुनीता को गुस्सा आया।
असल गुस्सा।
क्योंकि अब बात
सिर्फ उसकी नहीं थी
बच्चों तक पहुँच चुकी थी।
उसने बहस नहीं की।
बस चुप हो गई।
अगले दिन
सुनीता सुबह नहीं उठी।
जब अमित ने ऑफिस जाते वक्त
लंच बॉक्स पूछा,
वो बिना कुछ कहे
वॉशरूम में चली गई।
अमित ने ध्यान नहीं दिया।
वो वैसे भी
ध्यान देने का आदी नहीं था।
लेकिन अब
सुनीता ने चुप्पी को
आइना बना लिया था।
कभी कपड़े प्रेस नहीं होते।
कभी लंच अधूरा।
और जब अमित कुछ कहने आता,
सुनीता उठकर चली जाती।
ऊपरवाले का शुक्र था
कि बच्चे छुट्टियों में
नानी के घर थे।
एक हफ्ता भी नहीं बीता
और अमित बेचैन होने लगा।
उसे एहसास होने लगा -
जो खालीपन आज वो महसूस कर रहा है,
वही सुनीता
सालों से जी रही थी।
उसे याद आने लगा
कितनी बार उसने
सुनीता की बात काटी।
कितनी बार कहा -
“तुम घर पर ही तो रहती हो।”
अब उसे समझ आ रहा था
अनदेखी भी दर्द देती है।
एक सुबह
अमित ने खुद कहा -
“चलो… काउंसलर के पास चलते हैं।
शादी को एक और मौका देते हैं।”
सुनीता की आँखें भर आईं।
इस बार
खुशी से।
दोनों ने साथ बैठकर नाश्ता किया।
काम निपटाया।
और काउंसलिंग के लिए निकल पड़े।
घर से निकलते वक्त
अमित ने सुनीता का हाथ पकड़ा
“मुझे माफ कर देना,”
उसने कहा।
“मैं जानबूझकर नहीं,
पर बहुत गलत करता रहा।”
सुनीता ने कुछ नहीं कहा।
हाथ थामे रखा।
आज
सब कुछ परफेक्ट नहीं है।
लेकिन अब
बात होती है।
सुनी जाती है।
और सुनीता मन ही मन
अपनी बेटी को धन्यवाद देती है
क्योंकि कभी-कभी
बच्चे हमें वो सिखा देते हैं
जो हम सालों से नजरअंदाज कर रहे होते हैं।
💛 गुरुकृपा

Wah bahut badiya 🫰
ReplyDeleteWow❤️
ReplyDeleteBahut achi❤️
ReplyDeleteExcellent story❤️
ReplyDeleteWaah❤️
ReplyDeleteBahut achi kahani hai❤️
ReplyDeleteBahut achi kahani hai mummy❤️
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