1 जनवरी 2026 की सुबह थी।
शहर के पुराने हिस्से में बनी एक इमारत की छत पर खड़ा था समर। उसके सामने फैला हुआ शहर अभी भी आधी नींद में था। सड़कों पर गिनी-चुनी गाड़ियाँ, मंदिर की घंटी और दूर कहीं से आती अज़ान—सब मिलकर एक अजीब-सी शांति रच रहे थे। समर के हाथ में एक पुरानी घड़ी थी। यह घड़ी उसके दादाजी की थी—वही दादाजी जो कहते थे, “वक़्त कभी खराब नहीं होता, इंसान रुक जाता है।”
घड़ी कई सालों से बंद थी। ठीक वैसे ही जैसे समर की ज़िंदगी।
पिछला साल उसके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। व्यापार में घाटा, दोस्तों की बेरुखी और परिवार का दबाव। वह हर दिन खुद को साबित करने में लगा रहा, लेकिन हर रात खालीपन के साथ खत्म होती रही।
उसे नया साल हमेशा एक औपचारिकता लगता था। आतिशबाज़ी, झूठी मुस्कानें और अगले दिन वही पुरानी ज़िंदगी। तभी नीचे गली में हलचल हुई।
कुछ लोग एक बूढ़े आदमी के पास जमा थे, जो ठंड में काँपते हुए सड़क किनारे बैठा था। पास से गुजरने वाले लोग सिक्के डालकर आगे बढ़ रहे थे। समर भी नीचे उतर आया।
उस बूढ़े ने समर को देखकर कहा,
“बेटा, नया साल मुबारक हो।”
समर ने औपचारिक-सा सिर हिलाया।
“आप यहाँ क्यों बैठे हैं इतनी ठंड में?”
बूढ़ा हल्का-सा मुस्कराया,
“क्योंकि आज साल का पहला दिन है। आज यहाँ बैठना सही लगा।”
“हर दिन तो आप यहीं रहते हैं,” समर ने कहा।
बूढ़े की आँखों में चमक आई,
“हाँ, लेकिन हर दिन एक जैसा थोड़ी होता है।”
समर चुप हो गया।
बूढ़े ने समर के हाथ में घड़ी देखी।
“चलती क्यों नहीं?”
“खराब है,” समर बोला।
बूढ़ा हँसा,
“घड़ियाँ अक्सर खराब नहीं होतीं, बस उन्हें दोबारा चलाने की हिम्मत चाहिए।”
यह कहकर उसने घड़ी ली, पीछे से हल्का-सा झटका दिया और वापस कर दी। घड़ी नहीं चली।
बूढ़ा बोला,
“देखा? कोशिश भी ज़रूरी है, और वक़्त भी।”
समर उस दिन बहुत देर तक शहर में घूमता रहा।
उसने देखा
कोई परिवार ठंड में भी हँस रहा था,
कोई अकेला होकर भी सुकून में था,
और कोई सब कुछ होते हुए भी परेशान।
शाम को वह अपने कमरे में लौटा।
पुराने काग़ज़, अधूरी योजनाएँ और फेंक देने लायक सपने—सब सामने थे।
उसने पहली बार तय किया कि वह नया साल बदलने की उम्मीद नहीं करेगा, बल्कि खुद कुछ बदलेगा।
उसने एक डायरी खोली।
न कोई बड़ा लक्ष्य, न भारी वादे।
सिर्फ तीन बातें लिखीं
जो अधूरा है, उसे खत्म करूँगा
जो डराता है, उससे भागूँगा नहीं
जो हूँ, वही बनने की कोशिश करूँगा
रात के ठीक 12 बजे उसने घड़ी को फिर देखा।
वही बंद घड़ी।
अचानक उसने घड़ी को मेज़ पर रखा और धीरे से घुमाया।
टिक-टिक-
घड़ी चलने लगी।
समर मुस्कराया।
शायद घड़ी भी इंतज़ार कर रही थी
ठीक वक़्त का।
उस रात शहर में आतिशबाज़ी हुई,
लेकिन समर के लिए सबसे बड़ी आवाज़
उस बंद घड़ी का चलना था।
क्योंकि उसने समझ लिया था
नया साल वक़्त नहीं बदलता,
नया साल इंसान को मौका देता है
खुद को दोबारा शुरू करने का।

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