“खरमाला गाँव का रहस्य”
दरवाज़ा धीरे–धीरे चरमराता हुआ खुलने लगा।
चारों दोस्त एक साथ पीछे हट गए।
जैसे ही दरवाज़ा पूरी तरह खुला
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका अंदर आया।
लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान भीतर की ओर जाते हुए साफ दिख रहे थे
मानो कोई अदृश्य अभी उनसे होता हुआ कमरे में घुस चुका हो।
कव्या चीख पड़ी
“ये ये कैसे हो रहा है?”
तभी ऊपर लगी घंटी फिर तेज़ी से बजने लगी।
टन्… टन्… टन्…
और उसी के साथ गेस्ट हाउस का वो बूढ़ा मालिक तेज़ी से दौड़ता हुआ आया।
हांफते हुए बोला
“कमरे से बाहर चलो! तुरंत!”
चारों ने पूछा, “क्या हो रहा है?”
बूढ़ा धीरे से बोला
“जिसकी परछाई नहीं बनती
वो इस गाँव का रहवासी नहीं
वो तो यहाँ फँसे हुए लोग हैं।”
चारों सन्न।
वो उन्हें घड़ी की मीनार की ओर ले गया।
मीनार के पास पहुँचते ही हवा और भारी हो गई।
बूढ़े आदमी ने गहरी साँस ली और बोला—
“आज से ठीक बीस साल पहले, इसी रात
यहाँ चार दोस्त घूमने आए थे।”
आरव चौंक कर बोला, “हमारी तरह?”
बूढ़ा सिर हिलाया
“बिल्कुल तुम्हारी तरह।
और ठीक तुम्हारी तरह, उन्होंने भी रात में खिड़की खोली थी।”
मानसी की रूह काँप गई।
बूढ़ा बोला
“घंटी की आवाज़ जब आती है…
तो वो आत्माएँ उन लोगों को ढूँढती हैं जो ‘चार की टोली’ में हों।”
कव्या डरते हुए बोली—
“मतलब हमें क्यों?”
बूढ़ा धीरे से बोला
“क्योंकि आज रात उनके पूरे बीस साल पूरे हुए हैं।
और हर बीस साल में उन्हें अपनी जगह लेने के लिए चार नए लोग चाहिए।”
इतना सुनते ही घड़ी की मीनार के पीछे से चार धुंधले, काले साये उभरने लगे
उतने ही जितने पैर के निशान थे।
चारों दोस्त पीछे हटने लगे।
बूढ़ा चिल्लाया
“भागो! सूरज उगने से पहले गांव छोड़ दो!”
वे सब कार की ओर दौड़ पड़े।
साये तेजी से पीछे आने लगे।
मानसी के कंधे को कुछ ठंडा सा छू कर निकल गया — उसने चीख मारी।
चारों किसी तरह कार तक पहुँचे और इंजन चालू करते ही तेज़ी से गावं से बाहर भागे।
पीछे मुड़कर देखा
घड़ी की मीनार की घंटी अब अपने आप नहीं, बल्कि जैसे कोई जोर से हिला रहा था।
अगली सुबह
चारों शहर पहुँचकर राहत में थे।
लेकिन
जब उन्होंने कार के बोनट पर जमी धूल पर ध्यान दिया,
तो उसमें चार उंगलियों से लिखा हुआ एक संदेश था—
“अगली बीस साल की रात…
हम तुमसे मिलेंगे।”
चारों के चेहरों का रंग उड़ गया।
ना कोई इंसान साथ आया था,
ना रास्ते में कार रुकी थी।
फिर ये संदेश
किसने लिखा?

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