रमेश और दिलीप दोनों बहुत पक्के दोस्त थे। दानों साथ ही पढ़े। और किस्मत की बात देखो दोनों की job भी एक ही जगह लगी थी। दोनों की दोस्ती बहुत ही अच्छी चल रही थी। दोनों वैसे तो office में साथ रहते थे। लेकिन हफ्ते का एक दिन उन्होंने ऐसे fix किया हुआ था। दोनों एक दूसरे के घर बिताते थे। सब बहुत अच्छा चल रहा था।
कुछ समय बाद दिलीप के लिए एक रिश्ता आया। लड़की अच्छी थी, अच्छी job करती थी। सब सही रहा और दोनों की जल्द ही शादी हो गई। लेकिन उन दोनों की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा। हां एक बदलाव आ गया था अब वो एक दूसरे के घर पुरा दिन नहीं बिताते थे। बाकी सब बढ़िया चल रहा था। दो साल बीत गए दिलीप के घर एक प्यारी सी बेटी हुई। अब सब बहुत अच्छा चल रहा था।
इस बीच रमेश की भी शादी हो गई थी। अब हफ्ते का एक दिन दोनों फैमिली मिलकर outing में गुजराती थी। सब बढ़िया चल रहा था। तभी रमेश ने notice किया कि कुछ समय से दिलीप खोया - खोया रहता है। जल्दी चिढ़ जाता है। और जो कभी नहीं लड़ता था, वो हर दूसरी बात पर लड़ने लगा था। यह बात मैंने नहीं ऑफिस में सबने notice की थी।
रमेश ने एक बार बहुत हिम्मत करके उस से पूछा -
यार क्या बात है। कोई परेशानी है क्या?
वो बोला - नहीं तो, ऐसा कुछ नहीं है सब ठीक है।
रमेश बोला - नहीं यार, कुछ तो है। जो तुझे परेशान कर रहा है। मैं तुझे अच्छे से जनता हूं यार।
वो बोला - अरे नहीं भाई। बस इतना ही कहना था कि उसका सब्र का बांध टूट गया। और वो खूब ज़ोर - ज़ोर से रोने लगा।
रमेश को लगा बात छोटी नहीं है। उसने दिलीप के साथ उस दिन का half day लिया। और अपने और दिलीप के घर फोन कर दिया। कि वो और दिलीप 2 दिनों के लिए बाहर जा रहे है।
अब रमेश उसे लेकर शहर के बाहर एक गेस्ट हाउस में चला गया। वहां उस शाम तो उसने कुछ नहीं पूछा। दिलीप को शांत किया। खाना खिलाया और सुला दिया। अगले दिन दोनों उठे। नाश्ता किया। फिर उसने आराम से उससे पूछा - क्या बात है। अब बताओ। और जैसे ही उसने बताना शूरू किया। रमेश के होश उड़ गए।
उसने बताया कि सुनीता (उसकी पत्नी) उसे धोखा दे रही है। वो चुप - चुप कर किसी और से मिलती है। घंटो घंटो उससे बातें करती रहती है। सिया (उसकी बेटी) पर भी ध्यान नहीं देती। रमेश ने कहा कि उसे कुछ गलतफहमी हुई होगी। ऐसा नहीं हो सकता। तो उसने बताया कि सुनीता ने सामने से उस से तलाक मांगा है। और यही कारण है कि वो बिल्कुल टूट गया है। और अब उनके रिश्ते में कोई गुंजाइश नहीं रह गई है।
मगर मैने भी ठान लिया है - दिलीप बोला मैं इतनी आसानी से उसे तलाक नहीं दूंगा। उसे बताऊंगा कि धोखा देना कितना गलत है।
रमेश को दिलीप की बातें सही नहीं लगी। उसे समझाया कि अगर सुनीता मन बना चुकी है अलग होने का। तो वो नहीं मानेगी। वो अपनी बच्ची का भी नहीं सोच रही। इसलिए तलाक को टालना या लटकाना गलत होगा।
और रमेश ने उसी समय दिलीप के माता - पिता और उसकी पत्नी को भी बुला लिया। और साथ ही अपनी बीवी को फोन करके कहा कि वो दिलीप की बेटी को उनके माता - पिता के पास छोड़कर गेस्ट हाउस आ जाये। क्योंकि रमेश अपने आप को बहुत अकेला महसूस कर रहा था।
शाम तक सब आ गए थे। रमेश ने सब कुछ अपनी बीवी को बता दिया। फिर उसने सबसे पहले दिलीप के माता - पिता को सारी बात बताई। उन्हें बहुत ही दुख हुआ।
फिर उसने सुनीता से पूछा - कि दिलीप ने कभी आपके साथ कुछ गलत किया, कभी किसी बात के लिए रोका है।
सुनीता बोली - नहीं। लेकिन अब हम साथ नहीं रह सकते। क्योंकि मैं किसी और से प्यार करती हूं।
रमेश ने पूछा - सिया का क्या होगा।
सुनीता बोली - दिलीप उसे रख सकता है।
दिलीप को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। वो चिल्लाया - मैं तुम्हें तलाक नहीं दूंगा। चाहे तुम कुछ भी कर लो। सुनीता और दिलीप के बीच बहस बढ़ने लगी। जब कोई हल नहीं निकला तो सुनीता वहां से चली गई।
रमेश ने दिलीप को शांत किया और समझाया। कि जिद्द न करें। आराम से तलाक दे दे। मगर वो मानने का नाम ही नहीं ले रहा था। अब दिलीप भी वहां से चला गया।
अब रमेश को डर लगने लगा। क्योंकि उसने हाल ही में अभी ऐसे 2 - 3 case देखे थे। जिनमें जबर्दस्ती की शादी बचाने के चक्कर में कही बीवी ने, और कही पति ने अपने partner को मार दिया है। रमेश बिल्कुल नहीं चाहता था। कि उसके प्यारे दोस्त के हाथ कुछ गलत हो जाए। या उसकी पत्नी के द्वारा उसे नुकसान पहुंचाया जाए।
यह सोचकर रमेश के पसीने छूट गए। वो सबसे पहले दिलीप के घर गया। वहां उसने सबको समझाया। कि रिश्ते जबरदस्ती से नहीं निभते, प्यार से निभाए जाते है। और अगर तुम्हारा partner तुम्हें छोड़ना चाहता है तो उसे जाने दो। रोको नहीं। यह बात अब दिलीप के समझ में भी आ गई थी अब वो तलाक के लिए मान गया था।
और रमेश ने भी चैन की सांस ली। क्योंकि आज वो अपना सबसे प्यारा दोस्त खोते - खोते बच गया। कुछ दिनों बाद दिलीप ने भारी मन से तलाक के कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए।
आँखों में दर्द था, लेकिन दिल में अब जिद नहीं थी। उसने समझ लिया था कि जहाँ प्यार खत्म हो जाए, वहाँ जबरदस्ती सिर्फ नफरत को जन्म देती है।
सुनीता अपनी ज़िंदगी की राह पर चली गई, और दिलीप अपनी बेटी सिया के साथ एक नई शुरुआत की तैयारी करने लगा।
वो जानता था कि आने वाले दिन आसान नहीं होंगे, लेकिन अब उसके पास सच्चाई थी, सुकून था… और रमेश जैसा दोस्त था, जो हर हाल में उसके साथ खड़ा था।
रमेश ने दिलीप के कंधे पर हाथ रखकर बस इतना कहा —
“कुछ रिश्ते निभाने के लिए होते हैं, और कुछ हमें मजबूत बनाने के लिए टूटते हैं।”
और उसी दिन दिलीप ने तय कर लिया कि वो टूटा नहीं है,
बल्कि अब पहले से ज्यादा ज़िम्मेदार, समझदार और मजबूत इंसान बन चुका है।
क्योंकि रिश्ते जबरदस्ती से नहीं निभाए जाते…
और कभी-कभी किसी को छोड़ देना ही सबसे बड़ा इंसानी फैसला होता है।
एक बात मैं आप सब से कहना चाहती हूं कि रिश्ते जबरदस्ती से कभी भी नहीं निभाए जाते। जब रिश्तों में जबरदस्ती महसूस हो तो आपस में बात करो। और आपसी सहमति से अलग हो जाओ।
💛 गुरुकृपा

Good story
ReplyDeleteWow
ReplyDeleteWaah bahut achi kahani hai ❤️
ReplyDeleteGreat story🫡
ReplyDeleteGreat writer✍️
ReplyDeleteMummy bahut achi kahani hai✍️
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