वही बेंच - जहाँ दीपक बैठता था।
दीपक तीन दिनों से स्कूल नहीं आया था। पहले शिक्षकों ने सोचा - शायद बीमार होगा। फिर माना - घर की कोई परेशानी होगी। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह अचानक चुप क्यों हो गया।
असल बात यह थी कि दीपक कई दिनों से शिकायत लेकर प्रधानाचार्य के पास जाना चाहता था। क्लास में उसके पुराने जूते, फीकी वर्दी और साधारण टिफ़िन को लेकर कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे। उसने एक बार हिम्मत भी की थी, मगर उसकी बात पूरी सुनी ही नहीं गई।
उस दिन अपमान ने उसे स्कूल से दूर कर दिया।
तीसरे दिन सुबह, चपरासी रामू प्रधानाचार्य के कमरे में आया— "साहब, दीपक फिर नहीं आया।"
प्रधानाचार्य जी का ध्यान उस खाली बेंच पर गया। पहली बार उन्होंने सवाल किया - "आख़िर क्यों?"
कक्षा से मिली बातों ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। उन्हें एहसास हुआ कि शिकायत न सुनना भी एक बड़ी गलती होती है।
उसी समय प्रधानाचार्य जी ने दीपक के घर फ़ोन करवाया और कहा - "उसे कल ज़रूर भेजिए। अब कोई उसे जज नहीं करेगा।"
अगले दिन दीपक स्कूल आया। सुबह की सभा में प्रधानाचार्य जी ने सबके सामने कहा -
"बच्चो, स्कूल की वर्दी इसलिए होती है ताकि कोई अमीर-गरीब, बड़ा-छोटा न दिखे। यहाँ सब एक समान हैं। और आज के बाद कोई भी बच्चा किसी दूसरे बच्चे को जज नहीं करेगा। अगर किसी को परेशानी है, तो उसकी बात सुनी जाएगी।"
फिर उन्होंने दीपक की ओर देखकर कहा- "हमें देर से समझ आया, पर हमने अपनी गलती सुधार ली है।" दीपक की आँखें भर आईं।
उस दिन के बाद कक्षा की सबसे पीछे वाली बेंच कभी खाली नहीं रही।
क्योंकि जब सुना जाने लगा, तो चुप्पी खुद-ब-खुद टूट गई।
💛 आशीर्वादसहित

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